एक दशक बाद जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव में विपक्षी एकता का इतिहास फिर दोहराया जा रहा है। जिले का प्रथम नागरिक बनने की हाईप्रोफाइल जंग इस बार भी पूर्व मंत्री बनाम अन्य दलों की लड़ाई में तब्दील हो गई है। तब भी सत्ताधारी सपा और अन्य दलों का मुकाबला जिले की सियासत के दिग्गज पूर्व ऊर्जा मंत्री रामवीर उपाध्याय से ही था। एक तरफ पूर्व मंत्री की पत्नी सीमा उपाध्याय जिला पंचायत अध्यक्ष पद की प्रत्याशी थीं तो दूसरी तरफ सिकंदराराऊ के दिग्गज सपा नेता युवराज सिंह थे।
उस समय भी सपा प्रत्याशी को रालोद, भाजपा समेत अन्य दलों का अभूतपूर्व समर्थन मिला था। यहां तक कि आम तौर पर बिखरे रहने वाले सत्तापक्ष के दिग्गज भी पूर्व मंत्री के खिलाफ एक मंच पर आ गए थे। रालोद और भाजपा के नेता भी उनके साथ खड़े दिख रहे थे।
सपा-रालोद ने फिर दोहराया इतिहास
इस बार भी इतिहास खुद को दोहरा रहा है। तब भी सत्ता में रहते हुए सपा ने अध्यक्ष पद पर काबिज होने के लिए पूरा जाल फैलाया था। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय सपा प्रत्याशी को भाजपा का भी साथ मिला था, जबकि इस बार भाजपा के समर्थन पर जीते सभी सदस्य ही सत्तापक्ष के कब्जे में हैं। भले ही रालोद का एकमात्र सदस्य चुनाव जीता है, लेकिन रालोद इस बार भी बसपा के खिलाफ सत्तापक्ष के खेमे में खड़ा है।
धुर-विरोधी भी गलबहियां करते दिखे
अध्यक्ष पद के लिए शुक्रवार को हुए नामांकन के दौरान कलेक्ट्रेट में बसपा के खिलाफ विपक्षी एकता ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के धुर-विरोधी समझे जाने वाले सपा के नेता भी गलबहियां करते नजर आए। विपक्षी एकता का यह नजारा वहां मौजूद लोगों को वाकई हैरान कर देने वाला था। राजनीति में एक-दूसरे को दुश्मन बताने वाले नेताओं की यह दोस्ती यह संदेश भी दे रही थी कि सिर्फ दिखावे के लिए यह नेता एक-दूसरे को कोसते हैं। मतलब के लिए दलगत भावना उनके लिए कोई मायने नहीं रखती।
बसपा के लिए आसान नहीं मुकाबला
जिले की सियासत में चौथी बार बनी यह विपक्षी एकता क्या इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष की प्रतिष्ठापूर्ण लड़ाई में बसपा को मात दे पाएगी या फिर इस बार भी एकजुट विपक्ष को पिछले तीन मौकों की तरह मुंह की खानी पड़ेगी। सत्तापक्ष की जबर्दस्त घेराबंदी के बीच बने कई दलों के इस चक्रव्यूह को भेदना इस बार बसपा के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण लग रहा है।