तमाम कोशिशों के बावजूद जिले में पुरुष नसबंदी का ग्राफ बढ़ता नजर नहीं आ रहा है। नसबंदी के मामले में महिलाएं आज भी पुरुषों से कहीं आगे हैं। कुल मिलाकर परिवार नियोजन की पूरी जिम्मेदारी आज भी महिलाएं ही उठा रही हैं। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े गवाह हैं कि पिछले तीन सालों में जिले में महज 36 पुरुषों ने ही नसबंदी कराई है।
देश में बढ़ती जनसंख्या पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने परिवार नियोजन कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इसके तहत महिला और पुरुष दोनों की ही नसबंदी का प्राविधान किया गया है। परिवार नियोजन कार्यक्रम के नोडल अधिकारी व एसीएमओ डॉ. संतोष कुमार ने बताया कि हाथरस जैसे छोटे जिलों में ऐसी गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) नहीं हैं, जोकि पुरुषों को नसबंदी के प्रति जागरूक कर सकें। एनजीओ में काम करने वाले पुरुष कार्यकर्ता पुरुषों को नसबंदी के लिए आसानी से प्रेरित कर लेते हैं।
स्वास्थ्य विभाग में काम करने वाली आशा कार्यकर्ता महिलाएं होती हैं। वह पुरुषों को प्रेरित नहीं कर पातीं, इसलिए पुरुष नसबंदी महिलाओं की तुलना में कम होती है। इसके अलावा पुरुषों में नसबंदी के प्रति कई प्रकार की गलत धारणाएं बनी हुई हैं। पुरुषों में धारणा है कि नसबंदी कराने के बाद वह पहले जैसे नहीं रहेंगे, जिससे उनका दांपत्य जीवन प्रभावित हो जाएगा, जबकि ऐसा कुछ नहीं है। पुरुष नसबंदी महिलाओं की तुलना में अधिक आसान और सुरक्षित है।
तीन साल में नसबंदी के आंकड़े
साल महिला पुरुष
2020- 21 2065, 12
2021 -22 2138 , 12
2022-23 2213, 12
गलत धारणाओं के कारण पुरुष नसबंदी का आंकड़ा कम है। पुरुषों को परिवार नियोजन के प्रति जागरूक किया जा रहा है। भविष्य में पुरुष नसबंदी का आंकड़ा बढ़ जाएगा।
-डॉ. मंजीत सिंह, सीएमओ हाथरस।