जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) में वित्तीय अनियमितता का बड़ा मामला उजागर हुआ है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में टीचर एजुकेशन योजना के तहत आवंटित लाखों रुपये के बजट से नियमों को ताक पर रखकर खरीदारी और मनमाना भुगतान किया गया। मामले तब खुला जब वर्तमान वित्तीय वर्ष 2026-27 की फाइलों के परीक्षण के दौरान पुरानी पत्रावलियों की जांच की गई।
वरिष्ठ कोषाधिकारी की जांच में सामने आया है कि संस्थान की तत्कालीन (सेवानिवृत्त) प्राचार्य, एक कनिष्ठ सहायक और पांच सदस्यीय समिति यह अनियमितता की। इन लोगों ने मिलकर बिना सक्षम अधिकारियों की अनुमति के शर्तों को दरकिनार करते हुए वित्तीय नियमों की धज्जियां उड़ाईं। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी और मुख्य विकास अधिकारी के स्तर से अनियमितता में शामिल लोगों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी गई है।
इस मामले में जिला प्रशासन ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में कराए गए शिक्षक प्रशिक्षणों की प्रगति पुस्तिका, शोध कार्य पुस्तिका और आकस्मिक मद में खर्च की गई रकम का मदवार विस्तृत ब्योरा व अभिलेख तलब किए हैं। पत्रावलियों की जांच के बाद अनियमितता में शामिल लोगों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की संस्तुति की जाएगी।
फाइल डंप कर अपने स्तर से गठित कर ली समिति
पत्रावली की जांच में पाया गया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद लखनऊ ने टीचर एजुकेशन योजना के तहत कुल 38 लाख रुपये (प्रशिक्षण के लिए 25 लाख, आकस्मिक व्यय के लिए 10 लाख और शोध कार्य के लिए 3 लाख) का बजट आवंटित किया था। नियम के अनुसार जैम पोर्टल से खरीदारी की स्वीकृति तत्कालीन जिलाधिकारी से 8 जुलाई 2025 को इस शर्त पर ली गई थी कि भुगतान से पूर्व फाइल अलग से प्रस्तुत की जाएगी। आरोप है कि सेवानिवृत्त हो चुकीं तत्कालीन प्राचार्य ने पटल सहायक (कनिष्ठ लिपिक) के माध्यम से अनुमति की मुख्य पत्रावली को ही डंप दिया। इसके बाद 11 जुलाई 2025 को अपने ही स्तर से स्वयं को अध्यक्ष बनाते हुए पांच सदस्यीय समिति का गठन कर लिया।
आगरा की फर्म को दिया 17.68 लाख का ठेका, टुकड़ों में किया भुगतान
गठित समिति और पटल सहायक ने नियम विरुद्ध जाकर जैम पोर्टल पर बिड अपलोड की और आगरा की फर्म को चुनते हुए 20 अगस्त 2025 को 17,68,982.80 रुपये का कार्यादेश जारी कर दिया। इसके बाद वित्तीय नियमों को दरकिनार करते हुए फर्म को एकमुश्त भुगतान के बजाय टुकड़ों में भुगतान किया गया।
बिना जैम अनुपलब्धता प्रमाणपत्र के बाजार से सीधे खरीदा सामान
जांच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि विभिन्न मदों में प्राप्त सरकारी बजट को सीधे बाजार से ऑफलाइन सामान खरीदकर ठिकाने लगा दिया गया। नियमानुसार यदि जैम पोर्टल पर सामान उपलब्ध न हो, तो अनुपलब्धता प्रमाणपत्र लगाना अनिवार्य होता है, लेकिन फाइल में ऐसा कोई प्रमाणपत्र संलग्न नहीं पाया गया।
डायट प्राचार्य के स्तर पर कमेटी बनी थी। शासकीय व विभागीय स्तर पर कमेटी बनाने का अधिकार है। यह बजट पूरे साल का होता है। यह प्रशिक्षण बैच में होता है।
ममता अरुण, सहायक वित्त एवं लेखाधिकारी बेसिक- समिति सदस्य।
पिछले वर्ष इस मद में हुए खर्च के संबंध में पत्रावली मांगी गई थी, जो उन्हें परीक्षण के भेज दी गई है। मुख्य रूप से एक फर्म जिसे अधिकतम भुगतान हुआ है, उसके बारे में विस्तृत जानकारी मांगी गई है।
नबाव वर्मा, डायट प्राचार्य।