भूवेंद्र सेंगर
हाथरस। भूगर्भ जल स्तर में गिरावट की समस्या से जूझ रहे इस जिले में प्रशासन वाटर रिचार्जिंग के साधनों को लेकर बेहद बेपरवाह दिख रहा है। सात में से पांच विकास खंडों के डार्क जोन में पहुंचने से जिले में वाटर रिचार्जिंग के लिए योजनाएं तो करोड़ों की बनीं, लेकिन सबकी सब अफसरों की लालफीताशाही से फाइलों में ही कैद पड़ी हैं। ज्यादातर योजनाआें पर तो काम ही शुरू नहीं हुआ। जिन पर शुरू भी हो गया तो वह आज तक अधूरी हैं। यही वजह है कि जिले में भूगर्भ जल स्तर में गिरावट की समस्या दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है। उसकी रोकथाम के उपाय दिखावटी बनकर रह गए हैं। भूगर्भ जल स्तर को सहेजने के नाम पर सरकारी तंत्र की तरफ से दावे तो बड़े-बड़े किए जाते हैं, लेकिन असल में यह जमीनी कम, कागजी ज्यादा होते हैं। अगर सरकारी तंत्र का यही आलम रहा तो जिले में भूगर्भ जल स्तर में गिरावट की यह समस्या और खतरनाक रूप ले लेगी।
कागजों पर बन गए सोख पिट
शासन ने वाटर रिचार्जिंग के लिए सभी सरकारी भवनों में सोख पिट बनवाने के आदेश दिए थे, लेकिन हालात यह हैं कि जिले में किसी भी सरकारी भवन में भूजल के दोहन के बाद अनुपयोगी पानी को फिर से जमीन में पहुंचाने के लिए इनकी कोई व्यवस्था नहीं है। इनसे बर्बाद होने वाले पानी का काफी हद तक सदुपयोग किया जा सकता है।
कैटल टब की योजना बनी कागजी
जिले में सभी सरकारी हैंडपंपों के पास कैटल टब बनवाने की भी योजना थी। हैंडपंपों के पास गड्ढे खोदकर उनमें फिल्टर लगाकर पानी को जमीन के अंदर पहुंचाने के लिए यह सिस्टम बनाया गया था। शुरुआत में करीब 700 हैंडपंपों के पास यह टब बनवाने की योजना थी, लेकिन यह भी कागजी बनकर रह गई, जबकि वाटर रिचार्जिंग में यह अहम भूमिका निभा सकती थी। शासन ने इसके लिए धनराशि भी बढ़ाई थी।
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नए सरकारी भवनों में ही नहीं बने सिस्टम
नए सरकारी भवनों में वाटर रिचार्जिंग का सिस्टम बनवाने के आदेश अब से करीब आठ साल पहले शासन ने दिए थे। कलेक्ट्रेट, जिला अस्पताल, विकास भवन, पुलिस अधीक्षक कार्यालय, पुलिस लाइन जैसे भवनों में भी यह सिस्टम बनवाए जाने थे। इसमें छतों पर बारिश का पानी जमा करके उसे एक पाइप के जरिए नीचे बने गड्ढों में पहुंचाना था, जिसके बाद फिल्ट्रेशन कर इसे जमीन के अंदर पहुंचाने का सिस्टम तैयार होना था, लेकिन अफसोस अपने ही भवनों में प्रशासन इस योजना पर काम नहीं कर पाया। बाकी जगहों पर उससे क्या उम्मीद की जा सकती है।
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तालाब खुदाई योजना में लीपापोती
वाटर रिचार्जिंग के लिए ही शासन ने मनरेगा के तहत तालाब खुदवाने का निर्णय लिया था। सभी 430 ग्राम पंचायतों में एक-एक तालाब खुदवाना था। मनरेगा के अलावा आदर्श जलाशय योजना से भी इसके लिए बजट की व्यवस्था की गई। हर साल करोड़ों रुपये का बजट भी ठिकाने लगता रहा, लेकिन सच्चाई यह है कि ज्यादातर ग्राम पंचायतों में तालाब खुदे ही नहीं हैं। जहां खुदे भी, वहां अधूरे छोड़ दिए गए। कहीं कब्जों के चलते तालाबों की खुदाई पूरी नहीं हो सकी, जबकि वाटर रिचार्जिंग की यह सबसे महत्वपूर्ण योजना थी।
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चेक डेम पर भी लाखों की बर्बादी
शासन ने भूगर्भ जल स्तर में सुधार के लिए सिंचाई विभाग के माध्यम से करबन नदी में ही छह चेक डेम बनवाए। योजना में छह लाख से अधिक धनराशि प्रत्येक डेम पर खर्च की गई, लेकिन सिंचाई विभाग ने इन चेक डेमों के निर्माण के नाम पर इस नदी में सिर्फ कुछ स्थानों पर पत्थर डलवाने का काम ही किया है, जिससे यह योजना भी उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर पाई।
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-वाटर रिचार्जिंग की योजनाओं को लेकर शासन भी गंभीर है। इसके लिए पर्याप्त बजट की व्यवस्था भी की जा रही है। आने वाले समय में वाटर रिचार्जिंग के लिए बने चेक डेम और सोख पिट आदि का सत्यापन कराया जाएगा। जहां भी खामी मिलेगी, उन पर विधिवत रूप से कार्रवाई होगी।
-जावेद अख्तर जैदी, सीडीओ हाथरस
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