जिले में एचआईवी के प्रसार पर प्रभावी अंकुश लगाने और बिना लक्षण वाले सायलेंट संक्रमितों को समय रहते चिह्नित करने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने नई रणनीति तैयार की है। अब ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पताल की ओपीडी तक पहुंचने वाले कमजोर प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) वाले मरीजों की अनिवार्य स्क्रीनिंग की जाएगी।
विभाग के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऐसे संक्रमितों को तलाशना है, जिनमें एचआईवी के कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते और वे सालों तक इसके अनजान वाहक बने रहते हैं। इसको ध्यान में रखते हुए अब टीबी, बार-बार होने वाले बुखार, त्वचा संबंधी संक्रमण या लंबे समय से मामूली बीमारियों से पीड़ित मरीजों की विशेष जांच कराई जाएगी।
इसके साथ ही स्वास्थ्य विभाग एनजीओ के माध्यम से तीन प्रमुख उच्च जोखिम वाले वर्गों एमएसएम, एफएसडब्ल्यू और आईडीयू पर भी लगातार निगरानी बनाए हुए है। अधिकारियों के मुताबिक मौजूदा समय में एमएसएम और आईडीयू वर्ग से संक्रमण फैलने का जोखिम सबसे अधिक देखा जा रहा है।
रणनीति के प्रमुख बिंदु
ओपीडी स्तर पर सतर्कता : अस्पतालों की ओपीडी में तैनात डॉक्टरों को निर्देश दिए गए हैं कि वे संदिग्ध लक्षणों वाले मरीजों को तुरंत काउंसलर के पास भेजें।
गोपनीयता और काउंसिलिंग : स्क्रीनिंग के दौरान मरीजों की निजता का पूरा ध्यान रखा जाएगा। जांच से पहले और बाद में विधिवत काउंसिलिंग दी जाएगी।
साइलेंट मरीजों की पहचान : बिना लक्षण वाले मरीजों को सही समय पर खोजकर उनका एआरटी इलाज शुरू कराना मुख्य प्राथमिकता है।
-शुरुआती चरण में ही संक्रमण का पता लग जाने से मरीज को सही समय पर इलाज मुहैया कराया जा सकता है। इसके लिए सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात चिकित्सकों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है, जिससे मरीजों की ट्रेसिंग आसान होगी।
-डॉ. प्रवीण भारती, जिला एड्स नियंत्रण अधिकारी