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International Labour Day: अपने हक से दूर हैं लाखों श्रमिक, बीमा और पीएफ बनकर रह गए हैं सपना

Fri, 01 May 2026 03:22 PM IST
Chaman Kumar Sharma अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस

सार

हाथरस में सैंकड़ों फैक्टरियों में हजारों श्रमिक कार्यरत हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश को न तो भविष्य निधि यानि पीएफ का लाभ मिल रहा है और न ही बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं। नियमित रूप से काम लेने के बावजूद उन्हें दिहाड़ी मजदूर की तरह भुगतान दिया जाता है।
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शहर की एक निजी कंपनी के बाहर खड़े डिलीवरी बॉय - फोटो : संवाद
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विस्तार
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अपने खून-पसीने से जिले को औद्योगिक पहचान दिलाने वाले श्रमिकों की आर्थिक स्थिति बेहद चिंताजनक है। हाथरस जिले की फैक्टरियों से लेकर आधुनिक एप आधारित कंपनियों तक, श्रमिकों को मिलने वाले मूल अधिकार आज भी केवल बातों तक सीमित हैं। कागजों में मजबूत दिखने वाले श्रम कानून जमीनी स्तर पर लागू होते नजर नहीं आते।

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जिले में संचालित सैकड़ों फैक्टरियों में हजारों श्रमिक कार्यरत हैं, लेकिन इनमें से अधिकांश को न तो भविष्य निधि यानि पीएफ का लाभ मिल रहा है और न ही बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा सुविधाएं। नियमित रूप से काम लेने के बावजूद उन्हें दिहाड़ी मजदूर की तरह भुगतान दिया जाता है। छुट्टी लेने पर वेतन काट लिया जाता है। बेरोजगारी व जागरूकता में कमी के चलते श्रमिक अपने अधिकारों के लिए संघर्ष भी नहीं कर पा रहे।

मैं 20 साल में कई फैक्टरियों में काम कर चुका हूं, लेकिन फंड, बीमा जैसी सुविधा की कभी कोई बात ही नहीं हुई। पता नहीं कि यह कैसे मिलता है। मेरे पास एक बैंक खाता है, उसी में बीमा है। हर साल किस्त कटती है, फैक्टरी से सिर्फ पगार मिलती है।-मुकेश कुमार, तमनागढ़ी।
मैंने कई फैक्टरियों के साथ नामी कंपनियों में भी काम किया है, लेकिन फंड, बीमा, बोनस की सुविधा कहीं नहीं है। इसलिए मैंने निर्णय लिया कि खुद पर निर्भर होकर काम करुंगा, अब मैं अपना फोटोग्राफी का काम करता हूं और ई-रिक्शा चलाता हूं।-दिनेश कुमार, जलेसर रोड।

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ऐसा नहीं है कि जनपद में श्रमिकों को कोई लाभ नहीं मिल रहा। करीब 270 फैक्टरियां कारखाना एक्ट में पंजीकृत हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री ने श्रमिकों की मजदूरी बढ़ाई है। श्रमिकों के पंजीयन बढ़ाए जा रहे हैं।-सतेंद्र मिश्र, श्रम प्रवर्तन अधिकारी हाथरस

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ठेका व्यवस्था में शोषण
औद्योगिक इकाइयों में बड़ी संख्या में श्रमिक ठेका व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं। गैर-पंजीकृत ठेकेदारों के माध्यम से काम पर लगाए गए ये श्रमिक 300 से 500 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी पर काम करने को मजबूर हैं। न तो उनके काम के घंटे तय हैं और न ही किसी प्रकार की सुरक्षा गारंटी।

फैक्टरियों में सीमित लाभ
कारखाना एक्ट के तहत जिले में करीब 270 फैक्टरियां पंजीकृत हैं, लेकिन प्रत्येक में औसतन केवल 10 श्रमिकों को ही पीएफ, ईएसआई व अन्य सुविधाएं मिल पाती हैं। शेष श्रमिक ठेका या असंगठित रूप में काम करते हैं, जिन्हें इन सुविधाओं से वंचित रखा जाता है।

एप आधारित श्रमिक भी परेशान
नई अर्थव्यवस्था में एप आधारित कार्यों में लगे डिलीवरी बॉय और अन्य गिग वर्कर की स्थिति भी बेहतर नहीं है। बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए काम करने के बावजूद इन्हें न तो किसी प्रकार का फंड मिलता है और न ही बीमा या अवकाश। इनका भुगतान पूरी तरह डिलीवरी की संख्या पर आधारित होता है, जिससे आय भी अस्थिर रहती है। दुर्घटना या बीमारी की स्थिति में कोई सुरक्षा कवच नहीं होता।

मजदूरों की हकीकत
  • एक फैक्टरी में औसतन 10 श्रमिक, बाकी ठेका प्रथा में
  • सामाजिक सुरक्षा पाने वाले कुल श्रमिकों की संख्या 2900
  • दिहाड़ी मजदूरी : 300 से 500 रुपये प्रतिदिन तक
  • छुट्टी का पैसा कट रहा, दिहाड़ी में होता है भुगतान
  • डिलीवरी बॉय भी बीमा, फंड व अवकाश से वंचित
  • ठेका श्रमिकों को नहीं मिलती सामाजिक सुरक्षा
  • कारखाना एक्ट में 270 फैक्टरियां, 110 कोल्ड स्टोर
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