रबी की बुवाई से पहले डीएपी की जबरदस्त किल्लत थी और जगह-जगह हंगामे और प्रदर्शन हो रहे थे। यहां भारी मात्रा मिले डीएपी मिलने से साफ हो रहा है कि डीएपी की कालाबाजारी हो रही थी। किसानों के नाम पर सस्ता खाद खरीदकर उसे केमिकल फैक्टरियों में बेचा जा रहा था।
दरअसल, किसानों को दिए जाने वाले डीएपी और अन्य खाद पर अनुदान दिया जाता है। किसानों को डीएपी का कट्टा 1350 में मिलता है। इसमें 1650 रुपये का अनुदान होता है। औद्योगिक इकाइयों को अनुदान नहीं दिया जाता। उन्हें डीएपी का कट्टा 2950 रुपये में दिया जाता है। यूरिया का कट्टा किसानों को 266 में मिलता है, जिस पर 1650 रुपये का अनुदान होता है। यह अनुदान औद्योगिक इकाइयों को नहीं मिलता। ऐसे में माना जा रहा है कि किसानों के नाम पर खाद को खरीदा गया और उसे बिना मार्का के कट्टों में पैक कर कंपनियों को सप्लाई किया जा रहा था।