सिकंदराराऊ क्षेत्र के गांव एचोलाशहादतपुर से लेकर दर्जनों गांवों में विचरण करने वाले हिरनों के झुंड पानी को लेकर चारों तरफ मारे-मारे फिर रहे हैं। जहां भी नलकूप चलता नजर आता है पूरा झुंड प्यास बुझाने के लिए पहुंच जाता है। वन विभाग द्वारा खोदा गया तालाब पानी कम होने के कारण हिरनों की प्यास नहीं बुझा पा रहा है। बड़े क्षेत्रफल में बबूल के झाड़ों के कारण ही हिरन यहां जिंदा हैं।
गांव बरतरखास, टटी डंडिया, कपसिया, बमनहार, टीकरी खुर्द, एचोला शहादतपुर आदि में मस्क डीयर सफेद, काला हिरन, चीतल, सांभर सैंकड़ों की तादाद में विचरण करते हैं। ग्रामीणों के संरक्षण के कारण इनका शिकार नहीं हो पाता है। इसलिए इनकी तादाद यहां काफी हो गई है।
वर्तमान में पड़ रही भयंकर गर्मी हिरनों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। जैसे ही दोपहर के 11 बजते हैं हिरनों के झुंड मुंह ऊपर कर गहरी सांसे लेना प्रारंभ कर देते हैं। कारण भारी प्यास लगना तथा पानी की उपलब्धता न होना है। यह ऐसा समय है जिस समय जंगल में घास तक सूख जाती है तथा पानी के सभी स्त्रोत बेकार साबित हो जाते हैं।
मनुष्य से डरने वाले हिरन आज जहां भी नलकूप चलते देखते हैं। बिना डरे वहां पहुंच जाते हैं तथा अपनी प्यास बुझाते हैं। कभी झुंड के झुंड शहादतपुर के बबूल के झाड़ों में नजर आते थे, लेकिन पानी की घोर किल्लत के कारण अब पानी की तलाश में गांव गांव में मारे फिर रहे हैं। वन विभाग ने पानी के लिए एक छोटा तालाब बनाया है, लेकिन वो हिरनों की प्यास बुझाने में पूूरी तरह से नाकाम साबित हो रहा है। अभी हाल में पानी के प्यास के कारण एक काले हिरण की मौत का मामला प्रकाश में आया था। अगर पानी की उपलब्धता की व्यवस्था नहीं की गई तो और ज्यादा हिरन प्यासे मर सकते हैं।
हैंडपंप नहीं दे रहे पानी, सूख रहे तालाब
हाथरस। चिलचिलाती धूप और पड़ रही भीषण गर्मी ने लोगों को बेहाल करके रख दिया है। जहां बाहर आसमान से आग बरस रही है तो घर के अंदर दीवारें दहक रही हैं। तल्ख दोपहरी में घर से बाहर निकलना भी काफी मुश्किल हो रहा है। धूप में बाहर निकलते ही शरीर का तापमान भी हाई हो रहा है। राह चलते चलते कंठ सूखने लगा है। सोमवार को अधिकतम तापमान 44 और न्यूनतम तापमान 28 डिग्री सेल्सियस रहा।
मई माह के एक पखवाडे़ में तापमान हाई हो गया है। पिछले तीन-चार दिनों से चिल-चिलाती धूप ने हर किसी की चिंता बढ़ा दी है। मौसम में आए बदलाव का असर आम जनजीवन पर दिखाई देने लगा है। सुबह 8 बजे धूप असहनीय होने लगती है। घरों में छत पर रखी पेयजल टंकियों का पानी उबल रहा है। गला तर करने को ठंडे पानी की जरुरत हर किसी को महसूस होने लगी है। धूप के कारण रुटीन के कार्य सुबह और शाम को ही निपटाए जा रहे हैं। ग्रामीण अंचलों में तालाब सूखने शुरु हो गए हैं। हैडपंपों ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया है। इधर, गर्मी के साथ ही कूलर-पंखों को ठीक करने वाले मिस्त्रियों को फुरसत नहीं मिल पा रही है।