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हाथरस: इस बार नहीं होगा मेला श्रीदाऊजी महाराज का आयोजन

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हाथरस: मंदिर श्रीदाऊजी महाराज पर ​कलश स्थापना से पूर्व पूजा-अर्चना करते नगर पालिकाध्यक्ष आशीष श? - फोटो : HATHRAS
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
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बृज क्षेत्र के प्रसिद्ध लक्खी मेला श्रीदाऊजी महाराज पर कोरोना का ग्रहण लग गया है। सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक यह मेला श्रीदाऊजी महाराज इस वर्ष होने वाले सामाजिक, राजनीतिक और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हो सकेंगे। जिला प्रशासन ने यह स्पष्ट किया है कि कोरोना महामारी के चलते कोई भी आयोजन नहीं होंगे। मंदिर पर होने वाली पूजा-अर्चना भी सोशल डिस्टेंसिंग के साथ सीमित लोगों की मौजूदगी में हो सकेगी।
कोरोना महामारी के चलते इस बार मेला श्रीदाऊजी महाराज में होने वाले विभिन्न सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक कार्यक्रम नहीं हो सकेंगे। प्रतिवर्ष लगने वाले इस मेले में रोजाना हजारों की संख्या में लोग आते हैं। मेले में भारत केसरी और हिंद केसरी जैसी कुश्तियां होती हैं। यहां तक अन्य प्रांतों और जिलों से लोग मेले में शामिल होने के लिए आते हैं। कोरोना के चलते इस बार मेले का आयोजन नहीं हो सकेगा।
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15 दिन तक लगने वाले इस मेले में धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। यहां तक इस मेला परिसर में सभी समाजों के शिविर भी लगते हैं। समाज के बने शिविरों में तमाम तरह के कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं। मेले में प्रतिदिन हजारों की संख्या में लोग में आते हैं। डीएम प्रवीण कुमार लक्षकार ने बताया कि कोरोना महामारी के कारण मेला श्रीदाऊजी महाराज का आयोजन उचित नहीं है। मेले में किसी भी प्रकार के कार्यक्रम नहीं कराए जाएंगे। परंपरागत रुप से होने वाली पूजा-अर्चना सीमित व्यक्तियों की उपस्थिति में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ हो सकेगी।
पिछले साल 1.05 करोड़ रुपये में उठा था ठेका
हाथरस। मेला श्रीदाऊजी महाराज के आयोजन के लिए हर वर्ष लाखों रुपये का ठेका उठता है। पिछले वर्ष मेले का ठेका एक करोड़ पांच लाख रुपये का उठा था। इस ठेके से मिलने वाले पैसे से विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन होता है। कार्यक्रमों के संयोजकों को जिला प्रशासन कार्यक्रम के लिए आर्थिक मदद मुहैया कराता है। मेले में सर्कस, मौत का कुआं, झूले आदि मनोरंजन के साधन भी होते हैं।
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वर्ष 1912 से लगता आ रहा है मेला
हाथरस। वर्ष 1912 से यह मेला हर वर्ष लगता आ रहा है। मंदिर श्रीदाऊजी महाराज का निर्माण तो राजा दयाराम ने कराया था, लेकिन इस मेले की शुरुआत वर्ष 1912 में तत्कालीन तहसीलदार श्यामलाल ने कराई। कहा जाता है कि श्यामलाल का बेटा बीमार हो गया था। तब उन्हें सपना आया कि वह वह श्रीदाऊजी महाराज की पूजा-अर्चना के साथ मेला लगवाएं। ऐसा करने पर उनका बेटा स्वस्थ हो जाएगा। तभी से यहां मेले का आयोजन हर साल होता है। यह मेला उत्सव में बदल चुका है। कुश्ती दंगल इसका मुख्य आकर्षण है। यह मेला सांप्रदायिक एकता की भी मिसाल है। मंदिर पर जहां ध्वजारोहण किया जाता है तो काले खां की मजार पर चादर चढ़ाने से मेले की शुरुआत है।
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