न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
विधानसभा चुनाव में जीत के लिए सभी प्रमुख राजनीतिक दल एड़ी से चोटी तक का जोर लगाए हुए हैं। बसपा भी इसमें लगी है। कभी सोशल इंजीनियरिंग के सहारे प्रदेश की सत्ता पर काबिज रह चुकी बसपा के सामने इस बार कड़ी चुनौती है। बसपा से लगातार पांच बार विधायक चुने गए पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय इस बार भाजपा से चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि बसपा को बिना रामवीर के इस बार जिले में सफलता मिलेगी या नहीं।
यदि चुनावी इतिहास देखें जिले में तीनों सीटों पर बसपा को सफलता मिली है। बसपा ने हाथरस सीट से चार बार जीत हासिल की। सिकंदराराऊ और सादाबाद सीट से भी बसपा जीती। सपा-बसपा ने जिले में अपनी ताकत का अहसास वर्ष 1993 में कराया। तब बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े हिलाल अहमद कुरैशी करीब 900 वोटों से भाजपा के राजवीर सिंह पहलवान से हार गए थे। इसके बाद रामवीर उपाध्याय को बसपा ने टिकट दिया तो रामवीर उपाध्याय बसपा के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर फिट बैठे। रामवीर ने वर्ष 1996, 2002 और 2007 का चुनाव हाथरस सीट से जीता। उसके बाद जब हाथरस सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई तो वर्ष 2012 में इस सीट से बसपा के गेंदालाल चौधरी जीते। वर्ष 2012 में रामवीर बसपा से सिकंदराराऊ सीट से लड़े और वह वहां से जीत गए। वर्ष 2017 का चुनाव रामवीर ने सादाबाद सीट से बसपा से लड़ा।
भाजपा की लहर के बाद भी रामवीर उपाध्याय बसपा से चुनाव जीत गए। इस तरह से रामवीर ने जिले की तीनों सीटों पर अलग-अलग वर्ष में हुए चुनाव में जीत का परचम लहराया। इस बार स्थिति बदली हुई है। बसपा से निलंबन के बाद रामवीर ने भाजपा का दामन थाम लिया और भाजपा ने उन्हें सादाबाद सीट से प्रत्याशी भी घोषित कर दिया। वहीं बसपा ने इस बार नए चेहरों को मैदान में उतारा है। हाथरस से संजीव कुमार काका, सिकंदराराऊ से अवधेश कुमार सिंह और सादाबाद से डॉ. अविन शर्मा चुनाव मैदान में हैं।
वर्ष 1996 से लेकर वर्ष 2017 तक जिले में बसपा के खाते में कोई न कोई सीट गई है और इसमें पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय की अहम भूमिका रही है, लेकिन इस बार बसपा के पास जिले में रामवीर जैसा कद्दावर नेता नहीं हैं। रामवीर भाजपा में हैं और वह सादाबाद से भाजपा प्रत्याशी हैं। ऐसे में इस चुनाव में देखने वाली बात यह होगी कि बसपा का सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला जिले में इस चुनाव में चलेगा या नहीं। संवाद