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हाथरस : उपेक्षा के सन्नाटे में दब गई हसायन की चूड़ियों की खनक

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हाथरस : हसायन के मोहल्ला दखल स्थित चूड़ी की भट्ठी पर काम करते कारीगर। संवाद - फोटो : HASAYAN
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मुकुल भारद्वाज
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हसायन (हाथरस)। हरियाली तीज जैसे सुहाग के प्रतीक पर्व हों और हसायन की मशहूर सुहाग की लाल-हरी चूड़ियों का जिक्र न हो तो बात अधूरी रह जाती है। सुहाग नगरी की ख्याति बेशक फिरोजाबाद शहर को मिली है, लेकिन सुहाग की प्रतीक लाल-हरी चूड़ियां तो हसायन में ही बनती हैं। हरियाली तीज और करवा चौथ जैसे त्योहारों से पहले हसायन की भट्ठियों में कामकाजी हलचल बढ़ जाती है। कारीगर दिन-रात मेहनत करके चूड़ियां तैयार करते हैं और फिर देश भर में इनकी आपूर्ति की जाती है, लेकिन अफसोस की बात तो यह है कि मेहनत हसायन के कारोबारी और मजदूर करते हैं, लेकिन ख्याति मिलती है फिरोजाबाद के बडे़ कारोबारियों को। सरकारी उपेक्षा की वजह से हसायन का यह लघु उद्योग गुमनामी के अंधेरे में खोकर रह गया है।
बहुत कम लोग जानते होंगे कि हसायन में गुलाब के फूल से इत्र, खस और गुलकंद जैसे उत्पाद ही नहीं बनते, बल्कि यहां बनने वाली सुहाग की चूड़ियां भी देश भर में खनकती हैं। जिस तरह यहां गुलाब के फूल से बनने वाले उत्पादों पर कन्नौज के बड़े कारोबारियों की छाप लगती है। ठीक वैसा ही हाल यहां के चूड़ी उद्योग का भी है। काम हसायन में होता है और नाम कमाते हैं फिरोजाबाद के कारोबारी। चूड़ी कारोबार से जुड़े लोगों की मांग रही है कि जिस तरह गैस, अनुदान और मजदूरों को प्रशिक्षित करने की सुविधा फिरोजाबाद में मिल रही है, वैसी ही यहां के कारोबारियों और मजदूरों को भी दी जाए, जिससे यहां का चूड़ी उद्योग भी अपनी अलग पहचान बना सके।
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कस्बा हसायन में वर्षों से सुहाग की चूड़ियां तैयार होती हैं। हरे, लाल, पीली और कांस्य रंग की चूड़ियों के साथ सुहागिनों का गजरा और कंगन भी यहां तैयार होते हैं। वर्तमान में यहां चूड़ी बनाने के करीब 30 छोटे कारखाने हैं। कोई भी फर्म अभी तक पंजीकृत नहीं है। सुविधाओं के अभाव में कारोबारियों और मजदूरों को काफी परेशानियों से जूझना पड़ रहा है। भट्ठियों में चूड़ी पकाने के लिए लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। भट्ठियों पर काम करने वाले मजदूर इसके धुएं की वजह से गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। संवाद
फिरोजाबाद पर निर्भर हैं यहां के निर्माता
कस्बा के चूड़ी निर्माता पूरी तरह फिरोजाबाद पर निर्भर हैं। वह फिरोजाबाद के व्यापारियों से कांच का कच्चा माल खरीदने के उपरांत उससे चूड़ियां तैयार करते हैं और इस माल को फिरोजाबाद के कारोबारियों को ही बेचते हैं। मजदूर को 30 रुपये प्रति तोड़ा (240 चूड़ियों) के हिसाब से भुगतान मिलता है और उसके पीछे बैठने वाले फिरंगा मजदूर को 20 रुपये प्रति तोड़े के हिसाब से मजदूरी मिलती है, जबकि कारोबारी को 10 रुपये प्रति तोड़ा का ही लाभ हो पाता है। फायदा तो हो जब मजदूर को करीब 50 रुपये प्रति तोड़ा के हिसाब से भुगतान मिले और कारोबारी को 10 रुपये प्रति तोड़ा का मुनाफा मिले।
हसायन का चूड़ी उद्योग एक नजर में
-30 कुल भट्ठियां हैं चूड़ी बनाने की
-25 से 30 मजदूर एक भट्ठी पर करते हैं काम
-300 कुल मजदूर जुड़े हैं इस उद्योग से
-30 कारोबारी चला रहे हैं इस कारोबार को
बोले कारीगर व मजदूर
हमारी पुश्तों से यह काम चल रहा है। इसी वजह से हम भी इस काम से जुड़ गए, लेकिन सुविधाओं की कमी से अभी तक इस कारोबार की कोई उन्नति नहीं हुई है। इसी वजह से अब नये मजदूर भी इस काम के लिए नहीं मिल पाते।
-मोहसिन अली कारीगर/पैकार
चूड़ी के इस छोटे से कारोबार के सहारे कई गरीब तबके से जुड़े लोगों के परिवार पल रहे हैं, लेकिन आज तक किसी भी राजनीतिक दल व शासन-प्रशासन की तरफ से इस उद्योग को संरक्षण देने के पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है।
-टीकम सिंह कुशवाहा, मजदूर
फिरोजाबाद के व्यापारियों को माल दिए जाने की वजह से कारीगर व मजदूरों की मेहनत का मुनाफा स्थानीय पैकारों के बजाय फिरोजाबाद के व्यापारियों को ही मिलता है, जिससे यहां के निर्माता घाटे में रहते हैं और उन्हें परिवार पालने में भी मुश्किल होती है।
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-योगेंद्र सिंह, कारीगर
चूड़ी उद्योग में मेहनत व लागत लगाने के बाद मुनाफा न के बराबर है। सिर्फ दाल-रोटी का ही जुगाड़ चल पा रहा है। सुबह तीन बजे से कारीगर व मजदूरों को बुलाने के लिए भागदौड़ करनी पड़ती है, फिर भी मुनाफा उम्मीद से काफी कम रहता है।
-आस मोहम्मद, मजदूर
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