न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
क्या आपने किसी ऐसे शख्स के बारे में सुना है, जो अपनी वसीयत में यह लिखकर जाए कि उसकी मौत पर कोई रोये नहीं, बल्कि सब ठहाके लगा-लगाकर हंसें। हास्य व्यंग्य के आका कवि काका अपनी वसीयत में यही लिखकर गए थे। काका के निधन के बाद रात्रि को 12 बजे एक तरफ श्मशान स्थल पर उनकी चिता जल रही थी तो दूसरी ओर श्मशान स्थल पर ही हास्य कवि सम्मेलन हो रहा था। हजारों की संख्या में लोग इस कवि सम्मेलन में ठहाके मार-मारकर हंस रहे थे। उनकी वसीयत के अनुसार ही उनके शव को रात्रि में ऊंटगाड़ी पर श्मशान स्थल पर ले जाया गया था। ऐसे में काका हाथरसी ने जीते जी ही नहीं, बल्कि अपने निधन पर भी लोगों को जमकर हंसाया। वह इस दुनिया में लोगों को हंसाने के लिए ही आए थे। काका हाथरसी ने हास्य को हिंदी साहित्य में एक अहम स्थान दिलाया।
देश-विदेश में काका हाथरसी के नाम से प्रसिद्ध काका का असली नाम प्रभुलाल गर्ग था। 18 सितंबर 1906 को प्रभुलाल गर्ग का जन्म शहर की जैन गली में हुआ था। उनका बचपन काफी गरीबी में बीता। वह बचपन में इगलास में अपने मामा के यहां जाकर रहने लगे। गरीबी में उन्होंने चाट-पकौड़ी तक बेची। बचपन में ही काका में कविता के अंकुर फूटने लगे। उन्होेंने अपने मामा के पड़ोस में रहने वाले एक वकील साहब पर कविता लिख दी ‘एक पुलिंदा बांधकर कर दी उस पर सील, खोला तो निकले वहां लखमीचंद वकील’। किसी तरह से यह कविता वकील साहब ने भी पढ़ ली और पुरस्कार के रूप में काका की पिटाई हो गई।
काका को नाटकों में मंचन का अवसर भी मिला। ऐसे में प्रभुलाल ने एक नाटक में काका का किरदार निभाया। बस तभी से प्रभुलाल काका के नाम से मशहूर हो गए। 14 साल की अवस्था में काका फिर हाथरस आ गए। काका ने एक जगह मुनीम की नौकरी भी की, लेकिन यह नौकरी छूट गई। काका कवि ही नहीं थे, वह बेहतरीन चित्रकार और संगीतकार भी थे। काका की शादी रतन देवी से हुई, लेकिन काका की रचनाओं में वह काकी बनी रहीं। काका ने संगीत नाम की एक पत्रिका का भी प्रकाशन किया। यह पत्रिका आज भी प्रकाशित हो रही है। काका की पहली कविता इलाहाबाद (प्रयागराज) से प्रकाशित होने वाली पत्रिका गुलदस्ता में छपी ‘घुटा करती हैं मेरी हसरतें दिन रात सीने में, कहीं मेरा दिल घुटते-घुटते सख्त होकर सिल न बन जाए’।
इसके बाद काका की कविताएं लगातार प्रकाशित होने लगीं। कवि सम्मेलनों में भी उनका डंका बजने लगा। वर्ष 1957 में जब काका ने लालकिले से कविता पढ़ी तो उनकी ख्याति और फैल गई। काका को कई पुरस्कारों से नवाजा गया। 1985 में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा। कई बार काका विदेश में भी काव्यपाठ करने गए। 1989 में काका को वाल्टीमोर में ऑनरेरी सिटीजन का सम्मान मिला। काका अंग्रेजों के शासन के सख्त खिलाफ थे और स्वाधीनता आंदोलन में भी उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ कलम चलाई थी।
इसके लिए उन्हें वर्ष 1991 में सम्मानित किया गया था। काका से जुड़े कई किस्से प्रचलित हैं। एक बार डाकू भी कविता सुनने के लिए उन सहित कई कवियों को अपने ठिकाने पर ले गए और वहां उनसे कविताएं सुनीं। काका ने एक फिल्म जमुना किनारे भी बनाई। इसमें उन्होंने अभिनय भी किया। काका ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी से साथ भी मंच साझा किया। काका हास्य को टॉनिक बताते थे। उनका कहना था ‘डॉक्टर, वैद्य बतला रहे कुदरत का कानून, जितना हंसता आदमी, उतना बढ़ता खून, उतना बढ़ता खून, की जो हास्य में कंजूसी, सुंदर से चेहरे पर छायी देखो मनहूसी’।
काका कहते थे कि ‘गम-ए-जिंदगी नाराज न हो, मुझको आदत है मुस्कुराने की’। 18 सितंबर 1995 को काका ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन काका और हास्य साहित्य एक-दूसरे के पर्याय बने हुए हैं। यह भी इत्तिफाक ही है कि जिस दिन काका का जन्म हुआ, उनका निधन भी उसी दिन यानि 18 सितंबर को हुआ। काका के प्रमुख कविता संग्रहों में काका की फुलझड़ियां, काका के प्रहसन, लूटनीति मंथन करि, काका तरंग, जय बोलो बेईमान की, यार सप्तक, खिलखिलाहट, यार सप्तक, काका के व्यंग्य बाण, काका तरंग, मेरा जीवन ए-वन आदि हैं।
काका हाथरसी स्मारक में अभी नहीं बना है संग्रहालय
हाथरस। काका की यादों को संजोकर रखने के लिए मथुरा रोड स्थित ओढ़पुरा तिराहे पर काका हाथरसी स्मारक भवन भी है। इसमें काका हाथरसी की प्रतिमा लगी है और काका के रचित कुछ दोहे लिखे हैं। इस स्मारक को बनाने की पहल तत्कालीन डीएम रविकांत भटनागर ने की थी। एक एक साल में यह भवन बनकर तैयार हो गया। काका की स्मृति में यहां कार्यक्रम होने लगे। यह भी योजना बनाई गई कि काका की पुस्तकों को यहां रखा जाए और यहां पुस्तकालय बनाया जाए। काका एक बेहतरीन चित्रकार और संगीतकार भी थे। उनकी बनाई गई पेंटिंग और ब्रुश सहित अन्य वस्तुएं भी यहां रखी जाएं और एक म्यूजियम बनाया जाए, जिससे लोग जब यहां आएं तो काका के पूरे विराट व्यक्तित्व को जान सकें। अभी इस योजना पर अमल नहीं हुआ है। वहां म्यूजियम नहीं बना है। वर्ष 2008 में काका की एक प्रतिमा यहां जरूर लगाई गई है। संवाद
संसद में पढ़ी जाती रही हैं काका की रचनाएं
हाथरस। काका की रचनाएं संसद में भी गूंजती रहती हैं। खुद प्रधानमंत्री मोदी काका की रचनाओं के माध्यम से विपक्ष पर प्रहार करते रहते हैं। वर्ष 2017 में मोदी ने विपक्ष पर प्रहार करने के लिए काका की यह रचना संसद में पढ़ी थी।
‘अंतरपट में खोजिए छिपा हुआ है खोट, मिल जाएगी आपको बिल्कुल सत्य रिपोर्ट’
पिछले साल जब राहुल गांधी ने मोदी की आर्थिक नीतियों पर प्रहार किया था तो मोदी ने इसके जवाब में काका की यह रचना पढ़ी थी।
‘प्रकृति बदलती क्षण-क्षण देखो, बदल रहे हैं अणु कण देखो।
तुम निष्क्रिय से पड़े हुए हो, भाग्यवाद पर अड़े हुए हो।
छोड़ो मित्र पुरानी ढपली, जीवन में परिवर्तन लाओ।
परंपरा से ऊपर ऊठकर, कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ’