न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
हाथरस। इस विधानसभा चुनाव में जिले में भाजपा की स्थिति जहां जस की तस रही तो रालोद ने अपनी खोई हुई जमीन फिर से प्राप्त कर ली। बसपा का इस इस चुनाव में जिले में सूपड़ा साफ हो गया तो पिछले तीन दशक से चल रहा सूखा कांग्रेस समाप्त नहीं कर पाई और उसका कोई भी उम्मीदवार तीन हजार वोट भी नहीं पा सका। संवाद
पूरा जोर लगाने के बाद भी सादाबाद सीट नहीं जीत सकी भाजपा
हाथरस। जिले में इस विधानसभा चुनाव में भाजपा अपनी दोनो सीटें बचाए रखने में कामयाब रही। वर्ष 2017 में भाजपा ने हाथरस सदर और सिकंदराराऊ सीटें जीती थी। इस बार भी भाजपा ने दोनों सीटों पर अपना कब्जा बरकरार रखा। हाथरस सदर सीट पर भाजपा की जीत का ग्राफ बढ़ गया। पहले यह सीट भाजपा ने 70 हजार वोटों से जीती थी तो इस बार यह सीट एक लाख से ज्यादा वोटों से जीती। सिकंदराराऊ सीट भी कड़े मुकाबले में भाजपा ने निकाल ली। हालांकि पिछली बार की तुलना में जीत का अंतर कम हो गया। इस बार यह सीट भाजपा करीब आठ हजार वोटों से जीत पाई। पिछली बार यह सीट 12 हजार से ज्यादा वोटों से भाजपा ने जीती थी। इस बार उसे इस सीट पर सपा गठबंधन प्रत्याशी से कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ा। सादाबाद सीट पर पार्टी को इस बार भी कामयाबी नहीं मिली। पार्टी ने वहां से पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय पर दांव लगाया, लेकिन रामवीर भी इस सीट से नहीं जीत सके। वैसे पिछले चुनाव की अपेक्षा इस सीट पर भाजपा की स्थिति काफी सुधरी। पार्टी पिछली बार तीसरे नंबर पर थी तो इस बार कड़े मुकाबले में दूसरे स्थान पर रही।
रालोद को मिला गठबंधन का फायदा, सादाबाद सीट पर किया कब्जा
हाथरस। इस बार सपा और रालोद ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन का लाभ इस जिले में रालोद को मिला। जाट बहुल सादाबाद को रालोद का गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन वर्ष 2007 के बाद रालोद यहां जीत नहीं पाया था। इस बार रालोद और सपा के गठबंधन में रालोद के खाते में सादाबाद सीट आई थी। पूरी दमदारी के साथ रालोद ने चुनाव लड़ा और सपा से गठबंधन का लाभ उसे इस सीट पर मिला। रालोद का परंपरागत वोट तो उसे मिला ही। साथ ही सपा का वोट भी उसे मिला। जातीय समीकरण रालोद के हिसाब से फिट बैठे और रालोद प्रत्याशी प्रदीप उर्फ गुड्डू चौधरी ने भाजपा प्रत्याशी व पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय को चुनाव हराकर उनका विजय रथ रोक दिया। वहीं गठबंधन के तहत सपा ने हाथरस और सिकंदराराऊ सीट पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन यहां सपा को सफलता नहीं मिली। सिकंदराराऊ में सपा प्रत्याशी ललित बघेल ने कड़ी टक्कर भाजपा प्रत्याशी वीरेंद्र सिंह राना को दी, लेकिन योगी और मोदी के नाम राना फिर से चुनाव जीत गए। हाथरस सदर सीट पर भी सपा आज तक कोई चुनाव नहीं जीत सकी है। इस बार भी यही स्थिति रही। सपा प्रत्याशी बृजमोहन राही यहां तीसरे स्थान पर आए। संवाद
बसपा से रामवीर छिटके तो दोनों को ही हुआ नुकसान
हाथरस। बात यदि बसपा की करें तो वर्ष 1996 के बाद यह पहला ऐसा चुनाव है, जिसमें जिले में कोई भी सीट बसपा नहीं जीत सकी। कभी बसपा की इस जिले में काफी मजबूत स्थिति थी। बसपा के सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले पर यहां पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय फिट बैठते थे और बसपा के बैनर तले उन्होंने तीन बार हाथरस, एक बार सिकंदराराऊ और एक बार सादाबाद से जीत दर्ज की लेकिन इस बार रामवीर ने दल बदलकर भाजपा का दामन थामा तो न तो बसपा ही जीत सकी और न ही रामवीर। बसपा पिछले चुनाव में सादाबाद से जीती थी और सिकंदराराऊ व हाथरस से दूसरे स्थान पर रही थी। इस बार बसपा खाली हाथ रही। वह हाथरस सदर सीट पर दूसरे स्थान पर रही। सिकंदराराऊ और सादाबाद में वह मुख्य मुकाबले में भी नहीं रही। संवाद
किसी भी सीट पर कांग्रेस को तीन हजार वोट भी नहीं मिले
बात यदि कांग्रेस की करें तो कांग्रेस वर्ष 1985 के बाद आज तक जिले में कोई भी विधानसभा चुनाव नहीं जीत सकी। इस बार भी चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी जमानत नहीं बचा सके। हाथरस सदर पर कांग्रेस को महज 2436, सिकंदराराऊ सीट पर 1,159 और सादाबाद पर 2788वोट ही मिले। ऐसे में किसी भी सीट पर कांग्रेस तीन हजार वोट भी हासिल नहीं कर सकी। संवाद