हरियाली तीज पर घर-घर में भगवान शिव व माता पार्वती की पूजा हुई। शहर के मंदिरों में हरियारे शृंगार के साथ हरियाली छटा छाई रही। मंदिरों में सुबह से ही धार्मिक आयोजन आयोजित किए गए। हरियाली तीज को लेकर मंदिरों में सुबह से ही पूजा-अर्चना का सिलसिला शुरू हो गया। कई मंदिरों में भगवान को हरी पोशाक धारण कराई गई। शाम को हरी पत्तियों से शृंगार कराया। भजनों के साथ कीर्तन आदि का आयोजन हुआ। शहर के गड्ढेश्वर महादेव, दाऊजी मंदिर, बिहारी महाराज मंदिर, ठाकुर कन्हैयालाल महाराज मंदिर, गोविंद भगवान मंदिर, खाती खाना के सपरिया वाले मंदिर आदि पर विशेष आयोजन हुए।
हरियाली तीज सावन के महीने का महत्वपूर्ण त्योहार है, लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध ने इस त्योहार की रंगत भी बदलकर रख दी है। एक समय था जब हरियाली तीज का त्योहार बिना झूलों के अधूरा होता था। महिलाएं और युवतियां सामूहिक रूप से सावन की मल्हारें गाते हुए झूला झूलती थीं।
इन्हें चहकते देखकर घर का हर सदस्य उल्लास और उमंग से भर जाता था, लेकिन अब शहर में न तो बाग-बगीचे बचे हैं और न हीं त्योहारों के प्रति पहले जैसा उल्लास लोगों में बचा है। पेड़ों पर झूला झूलने की परंपरा यदा कदा ही देखने को मिलती है। मोहल्लों में सामूहिक रूप से मनाया जाने वाला यह त्योहार दूसरे त्योहारों की तरह अब क्लब व किटी पार्टियों में अपनी पैंठ बना चुका है। बुजुर्ग महिलाएं हरियाली तीज से जुड़ीं यादें साझा करते हुए आज भी उल्लास से भर जाती हैं।
शहर से सटे गांव नगला मोठा निवासी माया देवी का कहना है कि हरियाली तीज वक्त के साथ आधुनिक हो गई है। पहले यह त्योहार परिवारों में प्रेम भाव और सम्मान का प्रतीक होता था। देवरानी, जेठानी, सास एक साथ मिलकर त्योहार मनाती थीं, लेकिन अब यह सब बहुत कम देखने को मिलता है। जगह की कमी के कारण मकानों से आंगन खत्म हो गए, मोहल्लों से पेड़ गायब हो गए, अब कहां झूले डाले जाएं। पहले बहुओं के मायके से भाई या पिता सिंघारा लेकर आते थे।
देवरानी-जेठानी मिलकर झूला झूलती थीं
शहर के पुराना मिल कंपाउंड निवासी ओमवती अग्रवाल बताती हैं कि अब तो पता ही नहीं चलता कि कब त्योहार आए और कब चले गए। मेरे मायके में हरियाली तीज पर शिव-पार्वती के साथ गौर बनाए जाते थे। इनकी रक्षाबंधन तक सुहागिनें हर रोज पूजा करती थीं। परिवार व आस पड़ोस की देवरानी-जेठानी दो झूलों में पैर फंसाकर झूला झूलती थीं। बीना शर्मा बताती हैं कि वह सौभाग्यशाली हैं कि आज उनकी चार बहुएं हैं, जो उन्हें परंपराओं को निभाने में मदद करती हैं। परंपराओं को कायम रखने के लिए संयुक्त परिवारों का होना बहुत जरूरी है। एकल परिवार में यह सब नहीं हो पाता।