टिकट कटने के बाद बसपा से निष्कासन झेल रहे हाथरस के विधायक गेंदालाल चौधरी के भाजपा में शामिल होने से जिले की सियासत में हलचल मच गई है। बसपा विरोधी दल इसे पार्टी के लिए बड़ा झटका मान रहे हैं, जबकि बसपाई खेमा इसे बेहद हल्के में ले रहा है।
भगवा खेमे को उम्मीद है कि तो लगातार दो बार बसपा के टिकट पर विधायकी का चुनाव जीते गेंदालाल चौधरी दलित वोटों को भाजपा की तरफ मोड़ने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। उधर भाजपा के अंदर टिकट दावेदारों में भी बेचैनी बढ़ गई है। उन्हें लगता है कि गेंदालाल को टिकट मिला तो उनका पत्ता कट जाएगा।
भाजपा अब चुनाव में गेंदालाल के सही और सटीक इस्तेमाल की रणनीति बनाने में जुट गई है। बसपा के बेहद ठोस समझे जाने वाले दलित वोट बैंक को लेकर भगवा खेमे की उम्मीदों को भी पंख लग गए हैं। भाजपाइयों को लगता है कि गेंदालाल की मदद से वह लगातार 20 साल से हाथरस विधानसभा सीट पर काबिज बसपा के प्रभुत्व को तगड़ी चुनौती दे सकते हैं।
पहले टिकट कटने और उसके बाद बसपा से निष्कासित होने का दंश झेल रहे विधायक गेंदालाल भी नीले खेमे में खलबली मचाने के लिए पूरा दम लगा रहे हैं। इसी रणनीति के तहत उन्होंने खुद से पहले अपने सैकड़ों समर्थकों की किश्तों में भाजपा में एंट्री करवाई।
यही नहीं गुरुवार को जब लखनऊ में विधायक भगवा चोला पहन रहे थे, उसी वक्त हाथरस में भी उनकी पूरी टीम भाजपाई कुनबे में शामिल हो रही थी। लखनऊ से लौटने के बाद विधायक ने एकांत में अपनी टीम के साथ दिन भर भविष्य की रणनीति का ताना-बाना बुना।
विधायक की भाजपा में एंट्री से हाथरस (सुरक्षित) विधानसभा सीट पर भाजपा की टिकट के दूसरे दावेदारों में भी बेचैनी पैदा हो गई है। उन्हें डर है कि कहीं वह उनकी दावेदारी के लिए चुनौती खड़ी नहीं कर दें। हालांकि विधायक खेमा खुले तौर पर तो यही कह रहा है कि टिकट के लिए उनकी कोई शर्त नहीं है, भाजपा में शामिल होने के पीछे कहीं न कहीं टिकट की मंशा तो छिपी है।
विधायक के पार्टी में आने से भाजपा को कितना फायदा होगा, यह तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे, लेकिन फायदा होगा, यह बिल्कुल तय है। दलित समाज समझ चुका है कि भाजपा ही उन्हें उज्जवल भविष्य दे सकती है, इसलिए उसका रुझान तेजी से भाजपा की तरफ हो रहा है।
- रामवीर सिंह परमार, भाजपा जिलाध्यक्ष
वहीं बसपाई खेमा बेशक यह दावा कर रहा है कि विधायक के जाने से पार्टी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन इस खेमे में विधायक के इस कदम के नफा-नुकसान का आकलन शुरू हो चुका है। पार्टी इस नुकसान की भरपाई की रणनीति बनाने में जुट गई है। आला नेताओं के बीच मंथन का दौर चल रहा है। पार्टी जल्द ही कोई ऐसा आयोजन कराने की तैयारी में है, जिससे परंपरागत दलित वोटरों को बसपा के पक्ष में लामबंद रखा जा सके। उन्हें यह समझाया जा सके कि बसपा कमजोर हुई तो समाज कमजोर होगा।