गिरोह के निशाने पर ट्रांसपोर्टर रहते थे। पुलिस पूछताछ में इरफान ने बताया कि वह फर्जी आर्मी अफसर बनकर ट्रांसपोर्टर को फोन करता और कहता कि उसका ट्रांसफर कोलकाता से दिल्ली हो गया है। सामान आना है। ट्रांसपोर्टर ने यदि 30 हजार रुपये भाड़ा बताया तो वह उसे कहता कि 70 हजार का बिल दो सेना मुख्यालय से इतना ही भुगतान करा देंगे, उसमें से 30 हजार मुझे भेज देना। फिर ट्रांसपोर्टर को वर्दी में अपने फोटो के साथ मुख्यालय की लोकेशन भेज देता और 30 हजार रुपये से उससे पहले ही मंगा लेता। कभी इरफान तो कभी तारिफ अधिकारी बनकर कॉल करता था। सीबीआई और पुलिस अधिकारी बनकर भी ठगी की है।
पैसा आते ही दूसरे सदस्य हो जाते सक्रिय
जैसा ही पैसा खाते में आता वसीम उसे निकाल लेता था। 50 फीसदी इरफान, दस फीसदी वसीम रख लेता बाकी गिरोह के सदस्य आपस में बांट लेते थे। आगरा के अंसार, हमजा, हाशिम पांच हजार रुपये लेकर खाते उपलब्ध कराते थे। इसके लिए यह लोगों को लालच देकर उनसे आईडी और अन्य दस्तावेज लेकर उनके नाम पर खाते खुलवाते थे। उन्हें भी 2500 रुपये दिए जाते थे, लेकिन पास बुक और डेबिट कार्ड वसीम अपने पास रखता था। खाता खुल जाने के बाद वसीम उसकी जानकारी अपने गांव के मुस्तकीम , आरिफ, अलताफ, वारिस, शाहिल, आबिद को देता था।