नये भंडारण सत्र के लिए अगले दो सप्ताह के अंदर शीतगृहों को पूरी तरह खाली किया जाना है, जबकि इनमें 40 से 50 फीसदी आलू अभी तक भरा हुआ है। देश की मंडियों में आलू के दाम इस तरह धराशाई हैं कि किसानों का भाड़ा भी नहीं निकल रहा। लिहाजा वे शीतगृहों से अपनी फसल नहीं निकाल रहे। बुलावे के बाद भी न आने पर किसानों का आलू बाहर फेंका जा रहा है।
किसानों को उम्मीद थी कि दीवाली से पूर्व आलू के भावों में कुछ सुधार अवश्य होगा, लेकिन अभी आलू 100 से 125 रुपये प्रति पैकेट की दर से ही बिक रहा है। किसानों को मुनाफे के लिए इसका रेट 450 से 500 रुपये प्रति पैकेट के आसपास होना चाहिए। किसान पूरे सीजन आलू के भाव में सुधार होने की उम्मीद में बैठे रहे। अब आलू की निकासी का अंतिम समय आ गया है। 15 से 20 अक्तूबर तक सभी शीतगृहों से आलू की निकासी का कार्य पूर्ण होना है, लेकिन अब भी शीतगृहों में 40 से 50 प्रतिशत तक आलू भंडारित है।
अब तक किसान इस उम्मीद में थे कि दीवाली से पहले आलू के भाव में निश्चित ही कुछ सुधार होगा, लेकिन इसकी भी उम्मीद अब खत्म होती दिखाई दे रही है। 19 अक्तूबर की दीवाली है, जबकि देश की मंडियों में आलू की मांग ही नहीं बढ़ रही है। इससे अब किसानों के लिए अपना आलू शीतगृहों से निकालना मजबूरी होगी, लेकिन बाजार में आलू का जो रेट है, उसमें उनके लिए कोल्ड स्टोरों का भाड़ा चुकाना भी मुश्किल होगा। अगर वह आलू की निकासी करते हैं तो भाड़े का खर्च उन्हें खुद वहन करना होगा। मतलब, फसल तो नुकसान पर बिकेगी ही, भाड़े का खर्च भी किसान के सिर आ जाएगा। ऐसे में किसान भाड़े का बोझ सिर लेने की स्थिति में नहीं है। भारी मन से उन्हें अपना आलू कोल्ड स्टोरों में छोड़ना पड़ रहा है।