सहपऊ में चार साल पहले हमने अपने खेतों में फालसे की खेती की थी। इस फसल की पैदावार में काफी मेहनत करनी पड़ती है। साल में केवल एक बार ही इसे कर सकते हैं। देखरेख के लिए लोग न होने की वजह से इस खेती को छोड़ना पड़ा है। अब खेत को बंटाई पर उठा दिया है।- योगेश कुमार, किसान, सहपऊ।
करीब 10 साल पहले हमने अपने खेत में फालसे की पैदावार की थी, लेकिन अब इसकी खेती नहीं करते हैं। मुनाफा अधिक न होने की वजह से इसकी खेती करना छोड़ दिया है।-मनीष भूमिधर, सासनी, किसान।
इस बार हमने 17 बीघा खेत में फालसे किए हैं। पहले क्षेत्र में अन्य किसान भी इसकी पैदावार करते थे, लेकिन मुनाफा कम होने की वजह अब वह अन्य फसल करते हैं। - युवराज सिंह, सासनी, किसान।
हाथरस में अब फालसे की खेती नहीं हो रही है। साल में एक बार इसकी पैदावार होती है। किसानों को इसकी बागवानी के लिए जागरूक किया जाएगा।- अनीता सिंह, जिला उद्यान अधिकारी।
आगरा से होती है आवक
अलीगढ़ और हाथरस में पैदावार न होने की वजह से फालसा आगरा के सैंया, रोहता और जारुआ कटरा से मंगाया जाता है। भाव अधिक होने की वजह से बाजार में इसकी मांग कम होती है।
सेहत को फायदा पहुंचाते हैं फालसे
छोेटे बेर के आकार का दिखने वाला काले रंग का यह फल गर्मियों के दिनों में सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है। शरीर को ठंडा रखने के साथ ही यह पाचन तंत्र में सुधार लाता है और रक्तचाप नियंत्रित करने में मदद करता है। इसमें फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और कई पोषक तत्व होते हैं।