तालाब चौराहे पर बस के इंतजार में खड़ीं शिवधारा। संवाद
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78 की उम्र..एक हाथ में थैला और एक में बटुआ, चेहरे पर ढलती उम्र की झुर्रियां और मुंह में एक भी दांत नहीं। दुबली-पतली सी शिवधारा की आंखों में भाई की कलाई पर राखी बांधने का जो उत्साह था, वह देखते ही बन रहा था। वह अकेले ही घर से निकल पड़ीं। तालाब चौराहे पर पुलिस के अफसर भी उन्हें देख सन्न रह गए।
वे बस के लिए परेशान थीं, लेकिन एटा पहुंचकर भाई की कलाई पर शुभ मुहूर्त में राखी बांधने का जुनून उनके कदम थामे हुए था। कोई समाधान न दिखने पर शिवधारा थैला लिए वर्दीधारियों के पास पहुंच गई। बेझिझक बस के बारे में पूछा, सिकंदराराऊ जावे वारी बस कितनी देर में आवेगी। दरोगा ने पूछा आम्मा कोई साथ नहीं है क्या? अम्मा बोली बालक अपनी रिश्तेदारी में गए हैं। मैं हर साल अकेली जावत हूं।
दरोग ने सलाह दी बुढ़ापे में घर बैठो, डाक से राखी भेज दिया करो। उन्होंने जवाब दिया राखी पै भाई के घर जावे ते बरकत होत है। 60 सालन में ऐसो कबऊ न भयो कि मैं रक्षाबंधन पर एटा नाय गई। जब तक हूं, तब तक भइया की कलाई सूनी नाए रहन दूंगी।
इस बीच हाथरस डिपो से कासंगज के लिए चलाई गई विशेष बस तालाब चौराहा पर पहुंच गई। थैले के लिए करीब 35 मिनट से इंतजार कर रही शिवधारा को पुलिस ने हाथ पकड़कर भीड़ को चीरते हुए बस में बैठाया। उन्हें सिकंदराराऊ के पंत चौराहे पर उतरना था और फिर वहां से एटा के लिए वाहन पकड़ना था। ढलती उम्र में भाई के प्रति शिवधारा के प्रेम ने एक बार फिर साबित किया रिश्तों में निश्छल अपनापन और वही मिठास अभी भी बाकी है।