जिले के सरकारी अस्पतालों में दवाओं की भारी किल्लत है। इस साल अस्पतालों को बहुत ही कम बजट दवाएं खरीदने के लिए दिया गया है। पिछले साल के मुकाबले यह बजट ऊंट के मुंह में जीरे की तरह है।
बजट नहीं होने से परेशान अस्पताल प्रशासन मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहा है। पहला तो कई जरूरी दवाएं अस्पतालों में नहीं है वहीं जो मरीज दवा लेने आ रहे हैं, उन्हें दवा तो दी जा रही है, लेकिन उसकी खुराक कम बताई जा रही है। जैसे जो गोली दिन में तीन बार लेनी चाहिए, उसे डॉक्टर एक या दो बार ही लेने की सलाह दे रहे हैं। इससे दवाओं का असर नहीं हो रहा और मरीज परेशान हैं।
टीबी अस्पताल को 29 की जगह मिले चार लाख
बजट की सबसे ज्यादा कटौती टीबी अस्पताल में की गई है। यहां साल 2012-13 में 35 लाख रुपये का बजट दिया गया था। इसके अगले साल यह 30 लाख रुपये किया गया। फिर 29 लाख कर दिया गया। बीते साल भी इतना ही बजट सरकार ने टीबी अस्पताल को दिया। इस साल 29 लाख की जगह केवल चार लाख रुपये ही दिए गए, जबकि बीते सालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है। टीबी अस्पताल में सालाना 20 हजार मरीज ओपीडी में दिखाने पहुंचते हैं। इंडोर में भी 400 के करीब मरीजाें का इलाज किया जाता है। दवाओं के बजट में कटौती का असर भी मरीजों पर पड़ रहा है। पहले जहां अस्पताल में 40 तरह की दवाएं मरीजों को बांटी जा रही थीं, वहीं अब केवल 14 तरह की दवाएं ही दी जा उपलब्ध हैं। टीबी अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को वहां कफ सीरप तक उपलब्ध नहीं है। पहले जहां पांच एंटीबायोटिक मौजूद रहते थे, अब एक ही एंटीबायोटिक के भरोसे अस्पताल चल रहा है। अस्पताल में बुखार, दर्द, एसीडिटी, हड्डी रोग, जुकाम, एलर्जी आदि रोगों की दवाओं का भी टोटा है।
महिला अस्पताल को मिले 35 की जगह 13 लाख
हालत महिला अस्पताल की भी पतली है। पिछले वित्तीय वर्ष में अस्पताल को दवाओं की खरीद के लिए 35 लाख रुपये का बजट मिला था। इससे पहले 2014-15 में यह बजट 50 लाख रुपये था। पिछली बार के मुकाबले इस साल काफी कम बजट सरकार ने दिया। अस्पताल को साल भर में केवल 13 लाख रुपये ही मिले। यह बजट पिछले साल के 35 लाख रुपये के बजट के मुकाबले आधा भी नहीं है। बजट कम होने के कारण अस्पताल में प्रसव के समय होने वाले दर्द को रोकने, प्रसव को रोके रखने और गर्भ में पल रहे बच्चे को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी दवाएं नहीं हैं। मजबूरी में गरीब मरीजों को महंगी दवाएं बाजार से खरीदनी पड़ रही हैं। बजट के कम होने के कारण अस्पताल थोड़ी बहुत दवाओं की लोकल खरीदारी भी कर रहा है लेकिन सस्ती दरों पर खरीदी गई इन दवाओं की गुणवत्ता संदेह के दायरे में है। अस्पताल में बीते साल जो कैल्श्यिम की टैबलेट दी जा रही थी, बजट कम होने के कारण इस साल उससे चौथाई कीमत वाले कैल्श्यिम की टैबलेट को खरीदा गया है। साफ है कि इस सबका बुरा असर मरीजों की सेहत पर भी पड़ेगा।
जिला अस्पताल को 90 की जगह 54 लाख
सरकार का दावा है कि जिला अस्पतालों में हर मर्ज की दवा मौजूद है। इस दावे की हकीकत जब पता की गई तो मालूम हुआ कि अस्पताल में केवल दो एंटी बायोटिक हैं वह भी नए जमाने के नहीं हैं। अस्पताल में बुखार की दवा पैरासीटामॉल की भारी कमी है। मरीजों को बस एक-दो गोलियां ही थमाई जा रही हैं। एंटी एलर्जिक, कफ सीरप, दस्त, गैस, खुजली और लिवर संबंधी रोगाें की सामान्य दवाआें का भी काफी टोटा है। अस्पताल को पिछले साल सरकार ने दवाओं के लिए 90 लाख रुपये दिए थे। इस बार पूरे वित्तीय वर्ष में केवल 54 लाख रुपये ही आए हैं। यानी आधे से थोड़ा ज्यादा बजट। नाम न छापने की शर्त पर डॉक्टर बताते हैं कि वह मजबूरी में मरीजाें को कम खुराक लेने का परामर्श दे रहे हैं। इससे मरीजों को फायदा नहीं होता। उनका कोर्स समय से पूरा नहीं हो पाता। कोर्स कर वह कम समय में सही हो सकते हैं लेकिन खुराक कम होने के कारण दवाएं असर नहीं कर पातीं और मरीज लंबे समय तक इलाज कराकर ज्यादा गोलियां खा लेते हैं। इससे उनकी किडनी पर भी बुरा असर पड़ सकता है।
पिछली बार से काफी कम बजट मिला है। दिसंबर में भी डिमांड भेजी गई थी जिसकी सप्लाई जनवरी में होनी थी। यह सप्लाई नहीं हो सकी है। सप्लाई आते ही दवाओं की कमी पूरी हो जाएगी। वैसे अभी एक महीने के लिए अस्पताल में सभी तरह की दवाएं उपलब्ध हैं। कुछ दवाओं की लोकल स्तर पर खरीदा गया है।
--डॉ. आईवी सिंह, सीएमएस, जिला अस्पताल--