यूपी परिवहन निगम की बसों में लंबे समय से फर्जी टिकट बनाने वाला रैकेट सक्रिय था। यही नहीं अधिकारियों ने कई बार फर्जी परिचालक पकड़े भी, लेकिन इतनी घोर लापरवाही बरती कि उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई तक दर्ज नहीं कराई, अलबत्ता खुद को स्मार्ट दिखाने के लिए इन अधिकारियों ने अपने वीडियो तक बनवा लिए। अब जब पूरा चिट्ठा सामने आ रहा है और तो इन अधिकारियों की यह करतूतें ही उनके लिए गले का फांस बनती दिख रही हैं। इससे यह स्पष्ट भी हो रहा है कि इन अधिकारियों से गैंग के घनिष्ठ संबंध थे। सूत्रों की मानें तो जांच में अब इन अधिकारियों से सवाल दागे जा रहे हैं कि आखिर उन्होंने उस समय प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं की।
सूत्रों के मुताबिक रोडवेज के प्रांतीय चेकिंग दल द्वारा 19 अक्तूबर 2017 को हाथरस डिपो की एक बस की चेकिंग की गई तो उस बस पर ड्यूटी पर तैनात परिचालक नहीं था। बस पर फर्जी परिचालक मौजूद था और वही टिकट काट रहा था। निरीक्षण दल की अगुवाई करने वाला अधिकारी पहले भी स्थानीय डिपो में जिम्मेदार पद पर रह चुका था। उसने निरीक्षण में यह फर्जी परिचालक पकड़ा। रोडवेज के नियम-कानून के साथ खुद को स्मार्ट और कर्तव्यनिष्ठ दिखाने के लिए अपनी इस कार्रवाई की वीडियो भी बनवाई। इसमें स्पष्ट है कि रोडवेज की हाथरस डिपो की बस पर जो परिचालक था, वह फर्जी था।
उसके बाद भी इस बस को रुकवाकर उसकी सवारियां किसी और बस में ट्रांसफर नहीं की गईं। फर्जी परिचालक को पुलिस के हवाले नहीं किया गया। यही नहीं बस उसके बाद भी उसी के हवाले रहने दी गई। बाद में निरीक्षण आख्या जरूर स्थानीय डिपो पर आई। इसके आधार पर बस के परिचालक, जोकि बस में सवार नहीं था, लेकिन ड्यूटी में था, उसकी संविदा समाप्त कर दी गई। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब बसों में फर्जी परिचालक चलते थे और अधिकारी इन्हें पकड़ते भी थे तो फिर बिना पुलिस के संज्ञान में डाले और मुकदमा दर्ज कराए इन्हें छोड़ क्यों देते थे। सूत्रों की मानें तो अब लखनऊ की जांच रिपोर्ट को ऐसे ही कई वीडियो हाथ लगे हैं। इसमें इन अधिकारियों की गर्दन फंसी हुई है। अधिकारी इसे लेकर खासे परेशान भी हैं।