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कागजों में दौड़, खेत में सन्नाटा: हाथरस में कुसुम योजाना का हाल ऐसा, धूप मुफ्त, फिर भी सिस्टम सुस्त

Sun, 01 Mar 2026 11:06 AM IST
Chaman Kumar Sharma प्रशांत भारती, अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस

सार

प्रधानमंत्री कुसुम योजना के तहत सोलर पंप लगाए जा रहे हैं। इससे डीजल का खर्च खत्म होता है। बिजली बिल का बोझ नहीं रहता। इससे प्रति एकड़ लागत घटती है और मुनाफा बढ़ता है। इतना ही नहीं, कुछ राज्यों में अतिरिक्त सोलर बिजली ग्रिड को बेचने की सुविधा भी है।
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सहपऊ के किसान हरवीर और गिजरौली के मनोज खेतों पर पारंपरिक नलकूप दिखाते हुए - फोटो : संवाद
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विस्तार
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सुबह के करीब 11 बजे हैं। हाथरस शहर से कुछ सौ मीटर दूर गिजरौली गांव में 35 वर्षीय मनोज अपने खेत के किनारे खड़े हैं। खेत में गेहूं की फसल लहलहा रही है, लेकिन मोटर चलाने के लिए बिजली का इंतजार अब भी जारी है। 

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मनोज कहते हैं कि उन्होंने कई बार पीएम कुसुम योजना का नाम सुना है। रेडियो पर इसका कार्यक्रम भी सुना। उसमें बताया कि सोलर पंप लग जाए तो डीजल का खर्च बचेगा, बिजली का झंझट खत्म हो जाएगा। लेकिन लाभार्थी कैसे बनना है? आवेदन कहां करना है? किससे संपर्क करें? इसकी साफ जानकारी नहीं है। मनोज अकेले नहीं हैं। जिले में कई किसान इसी दुविधा में हैं। योजना के फायदे सब जानते हैं लेकिन इसकी प्रक्रिया कोई नहीं समझ पा रहा।

केंद्र और राज्य सरकार मिलकर पीएम कुसुम योजना पर जोर दे रहे हैं ताकि किसान को हरित और आत्मनिर्भर बनाया जा सके। सिंचाई के लिए किसान डीजल और अस्थिर बिजली पर निर्भर रहते हैं जिससे खेती की लागत बढ़ना तय है। ऐसे में प्रधानमंत्री कुसुम योजना के तहत सोलर पंप लगाए जा रहे हैं। इससे डीजल का खर्च खत्म होता है। बिजली बिल का बोझ नहीं रहता। इससे प्रति एकड़ लागत घटती है और मुनाफा बढ़ता है। इतना ही नहीं, कुछ राज्यों में अतिरिक्त सोलर बिजली ग्रिड को बेचने की सुविधा भी है। इससे किसान ऊर्जा उत्पादक बन सकता है। इसके बावजूद हाथरस जिले में यह योजना कागजों पर चमक रही है और खेतों तक नहीं पहुंचा पा रही।

किसानों ने रजिस्ट्रेशन किए हैं, अंशदान जमा करना होता है। अंशदान जमा होने के बाद नामित संस्था की ओर से ही पंप की स्थापना कराई जाती है। बोरिंग किसान खुद करते हैं। किसानों के इसके लिए जागरूक किया जा रहा है।- निखिल देव तिवारी, जिला कृषि अधिकारी।

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कागजों में दौड़, खेत में सन्नाटा
कृषि विभाग को इस वर्ष 199 सोलर पंप लगाने का लक्ष्य मिला है। लेकिन अब तक एक भी पंप जमीन पर नहीं उतरा। विभाग के पास 32 आवेदन जरूर आए जिनमें से 14 किसानों ने अंशदान भी जमा कर दिया। फिर भी पंप स्थापना शून्य है। सहपऊ के किसान हरबीर सिंह वर्मा कहते हैं कि ऑनलाइन आवेदन की बात कही जाती है। कई किसानों के पास न स्मार्टफोन है, न तकनीकी जानकारी। साइबर कैफे के चक्कर काटने पड़ते हैं। आवेदन कर भी दिया तो आगे क्या हुआ, इसकी जानकारी नहीं मिलती।

किसान की उम्मीद बनाम सिस्टम की सुस्ती
योजना का मकसद किसानों को सस्ती और स्थायी सिंचाई सुविधा देना है। सोलर पंप लगने से बिजली बिल और डीजल खर्च में राहत मिलती है। लेकिन जब लक्ष्य 199 का हो और उपलब्धि शून्य तो सवाल उठना लाजिमी है। गिजरौली के पास ही रहने वाले एक आवेदनकर्ता बताते हैं कि उन्हें पहले अंशदान जमा कराने के लिए कहा है, फिर नामित कंपनी पंप लगाएगी। उन्होंने पैसा जमा कर दिया लेकिन महीनों से कोई खबर नहीं। उन्होंने अपनी पहचान को छिपाने की शर्त पर कहा कि अगर सच में सोलर पंप लग जाए तो खेती आसान हो जाएगी। लेकिन अभी तो बस सुनने में अच्छा लगता है।

सवाल जो मांग रहे जवाब?
  • क्या प्रचार-प्रसार सिर्फ रेडियो और पोस्टर तक सीमित है?
  • क्या ऑनलाइन प्रक्रिया ग्रामीण किसानों के लिए जटिल है?
  • अंशदान लेने के बाद स्थापना में देरी क्यों?
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