जिले के चिकित्सक जेनरिक दवाएं नहीं लिखते हैं। लोगों के मन में भी यह भ्रम है कि यह दवाएं ब्रांडेड दवाओं की तुलना में कम काम करती हैं। इससे जन औषधि केंद्रों पर दवाओं की बिक्री कम हो पाती है। केंद्र संचालकों का कहना है कि उन्हें एक दिन में 400 रुपये की ही बचत मुश्किल से हो पाती है। इससे दुकान का खर्चा भी नहीं निकल पाता।
निराश होकर लौट जाते हैं मरीज
जिले में चिकित्सक मरीजों को जेनरिक दवाएं नहीं लिखते हैं, इसलिए अधिकांश जन औषधि केंद्रों पर दवाओं का स्टॉक सीमित ही होता है। काफी दवाएं मरीजों को इन केंद्रों पर उपलब्ध नहीं हो पाती हैं, जिससे यह मरीज निराश होकर लौट जाते हैं।