नए मानक के अनुसार अब 500 मीटर से एक किमी के दायरे में ही दूसरे ईंट-भट्ठे बनाने की अनुमति दी जा सकती है। पहले यह मानक 200 से लेकर 500 मीटर तक था। नए नियम को जिले में लागू करने की तैयारी की जा रही है।
जिगजैग सिस्टम का खर्च करीब 50 लाख
एक जिगजैग सिस्टम लगवाने के लिए भट्ठा स्वामी को करीब 50 लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यही कारण है कि भट्ठा मालिक इस तकनीक को अपनाने से बच रहे हैं। यही नहीं इस विधि से चिमनी बनवाने पर संचालक को शुरू के दिन से लगातार अंतिम दिन तक जेनरेटर की व्यवस्था करनी होगी। यह जेनरेटर 24 घंटे चलता रहेगा और तभी यह तकनीक सफल हो पाएगी। माना जा रहा है कि अगर सभी ने यह विधि अपनाई तो इसका असर ईंट के दामों पर भी पड़ेगा।
इस तरह काम करती है जिगजैग तकनीक
साधारण ईंट भट्ठों में आमतौर पर ईंट पकाने के लिए छल्लियों में सीधी हवा दी जाती है। जिगजैग विधि में टेढ़ी-मेढ़ी लाइन बनाकर पंखों से हवा दी जाती है। इसके चलते धुएं के ऊपर तक आते-आते उसके विषैले कारक टेढ़े-मेढ़े रास्तों में बैठ जाते हैं, जिससे चिमनी सफेद धुआं उगलती है। यहां यह बात भी अहम है कि पुरानी विधि से सामान्य तौर पर ईंट पकाने में 25-30 टन कोयला खर्च होता है, लेेकिन इस तकनीक से करीब 16 टन कोयले में काम चल जाता है। ईंटों की गुणवत्ता भी अच्छी होगी।
यह है शहर में प्रदूषण का आंकड़ा
माह प्रदूषण का मानक
- जनवरी 2025 151 एक्यूआई
- फरवरी 2025 155 एक्यूआई
- मार्च 2025 149 एक्यूआई
- अप्रैल 2025 143 एक्यूआई