मेला श्रीदाऊजी महाराज में आयोजित कार्यक्रम के दौरान मौजूद बशीर ब्रद। फाइल फोटो
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बड़े शायर का हाथरस शहर में आना सिर्फ एक इवेंट नहीं होता। वो पूरी एक नस्ल को जबान देता है। बशीर बद्र हाथरस आए थे तो सिर्फ शेर नहीं सुनाए थे, वो यहां की गलियों को ये यकीन दिला गए थे कि दर्द बयां करने के लिए दिल्ली-लखनऊ जाना जरूरी नहीं। शायरी से बशीर बद्र ने रुलाया और सोचने पर मजबूर किया। हाथरस को वर्ष 1999 में शब्दों का शहर बना दिया।
बशीर बद्र उर्दू शायरी का बहुत बड़ा नाम थे। हाथरस से उनका रिश्ता खास रहा है, क्योंकि वो खुद हाथरस में दाऊजी मेले के अखिल भारतीय कवि सम्मेलन के सिलसिले में कई बार यहां आए। साहित्य संगम संस्था के तत्वावधान में डॉ. जगदीश लवानिया के संयोजन में यह आयोजन हुआ था। उस समय मेले के अध्यक्ष विष्णु गौतम थे।
एक यादगार किस्सा
साहित्यकार विद्यासागर विकल बताते हैं कि 90 के दशक में हाथरस के कवि सम्मेलन में बशीर साहब को सुनने इतनी भीड़ आई कि दाऊजी मेले का पंडाल छोटा पड़ गया। आयोजकों ने माफी मांगी। बशीर साहब ने माइक पर कहा था शायरी छतों से भी सुनी जा सकती है, दिलों के दरवाजे खुले हों तो। फिर वह दो घंटे खड़े होकर छतों पर बैठे लोगों के लिए भी शायरी पढ़ते रहे।
हाथरस और शायरी का रिश्ता
हाथरस को कविता की धरती कहा जाता है। काका हाथरसी की हास्य व्यंग्य परंपरा ने इसे पहचान दी। ऐसे माहौल में बशीर बद्र जैसे शायरों का आना, शहर के अदबी मिजाज को और खाद-पानी देता है। वो जब आते थे तो पूरा शहर उमड़ पड़ता था।
कई बार हाथरस आए बशीर बद्र
विद्यासागर विकल बताते हैं कि मशहूर शायर बशीर बद्र का हाथरस से गहरा नाता था। वह कई बार हाथरस आए। वह तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ फरवरी 1999 में ऐतिहासिक दिल्ली-लाहौर बस यात्रा के दौरान पाकिस्तान गए थे। लाहौर में आयोजित मुशायरों और सम्मेलनों में उन्होंने कई गजलें पढ़ीं। इस यात्रा के दौरान और उसके बाद दोनों देशों के बीच संबंधों के संदर्भ में उनका यह शेर बहुत प्रसिद्ध हुआ था कि -दुश्मनी जमके करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदगी न हो।