मामले की सुनवाई अपर सत्र न्यायाधीश एफटीसी प्रथम महेंद्र कुमार रावत के न्यायालय में हुई। अभियोजन व बचाव पक्ष की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने मंगलवार निर्णय दिया। कोर्ट ने कहा कि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अभियुक्त को फंसाने के उद्देश्य से किसी ने फर्जी और मनगढ़ंत वीडियो तैयार किए हों। पीड़िताओं ने स्वयं आरोपों का खंडन किया। साक्ष्यों के अभाव में अभियुक्त रजनीश कुमार को सभी आरोपों से दोष मुक्त कर दिया गया।
तकनीकी साक्ष्य देने में गच्चा खा गई पुलिस
पुलिस अपनी विवेचना में साबित नहीं कर सकी कि जो सीडी सील कर कोर्ट में दाखिल की है, उसमें फोटो व वीडियो कहां से आए। बरामद लैपटॉप व मोबाइल विधि विज्ञान प्रयोगशाला भेजे गए थे, लेकिन न्यायालय में प्रस्तुत आख्या में इसका उल्लेख नहीं है कि वीडियो व फोटो इन्हीं लैपटॉप व मोबाइल से मिले हैं।
आर्टिफीशियल इंटेलीजेंस के जमाने में पुलिस ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी कि फोटो या वीडियो वास्तविक हैं या नहीं। इसलिए इस बात की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सका कि फोटो-वीडियो एआई जनरेटेड हैं। कोर्ट ने भी अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अर्जुन पंडितराव खोतकर बनाम कैलाश कुशनराव केस का जिक्र किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (जैसे सी.डी.) की सत्यता प्रमाणित करने के लिए धारा 65बी का प्रमाण पत्र अनिवार्य है, जो इस मामले में उपलब्ध नहीं था।
कोर्ट में पीड़िताएं बोलीं-पुलिस के दबाव में दिए थे बयान
अभियोजन पक्ष की ओर से नौ गवाह थे, जिनमें एक वादी मुकदमा, तीन पीड़िता, दो चिकित्सक, विवेचक व दो सिपाही शामिल थे। गवाही के दौरान तीनों पीड़िताओं ने प्रोफेसर पर कोई आरोप नहीं लगाए। पुलिस साक्षी की गवाही में भी प्रोफेसर पर आरोप सिद्ध नहीं हुए। पीड़िताओं ने भी कोर्ट में पुलिस के दबाव में बयान देने की बात कही।
पुलिस ने इस चर्चित मामले में 10 मई 2025 को न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया था। 16 जून को प्रकरण सत्र सुपुर्द किया गया। 18 अगस्त को आरोप तय किए गए और इसके बाद गवाहों का परीक्षण शुरू हुआ। कोर्ट में दिए अपने बयान में पहली पीड़िता ने कहा कि प्रोफेसर रजनीश ने उसके साथ कोई घटना नहीं की है और न ही कोई वीडियो बनाया। उसने केवल छह माह कॉलेज में काम किया था।
दूसरी पीडि़ता ने भी यही बात दोहराई। उसने बताया कि वह बागला डिग्री कॉलेज से बीए करने के बाद उसने यहीं से एमए किया था और भूगोल में प्रवेश लिया था। उसने कहा कि वह डॉक्टर रजनीश से मिलती-जुलती नहीं थी। उन्होंने कहा कि कोई घटना नहीं की गई और न ही उसका वीडियो बनाया। मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए बयानों को लेकर युवती ने न्यायालय में कहा कि वे बयान पुलिस के दबाव में दिए थे। पुलिस ने उसके भाई को थाने में बैठा लिया था और झूठा फंसाने की धमकी दी थी।
तीसरी पीड़िता ने कॉलेज की छात्रा होने की बात स्वींकारी, लेकिन प्रोफेसर द्वारा कोई कृत्य करने की बात से साफ इंकार किया। छात्रा ने कहा कि उसके द्वारा कोई शिकायत नहीं की गई और न ही पुलिस ने उसके बयान लिए थे। एक पीडि़ता ने शपथ पत्र के साथ सुप्रीम कोर्ट को पत्र भेजा था और अवगत कराया था कि उसके द्वारा विवेचक को कोई बयान नहीं दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट से वह प्रार्थना पत्र स्थानीय न्यायालय को भेजा गया था, जिसे सुनवाई में शामिल किया गया।
प्रोफेसर ने बताई कॉलेज की राजनीति
साक्ष्य सफाई में प्रोफेसर ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उन पर लगे सभी आरोप निराधार हैं। प्रोफेसर ने कहा कि कॉलेज की पार्टीबंदी एवं राजनीति से प्रेरित होकर झूठा मुकदमा चलाया गया है।