31 मार्च तक जिले को खुले में शौचमुक्त (ओडीएफ) का तमगा दिलाने में नाकाम रहे प्रशासन ने अब 30 अप्रैल तक यह उपलब्धि हासिल करने के लिए जोर लगा दिया है। सीडीओ एसके सिंह ने इन गांवों के लिए नामित किए गए नोडल अधिकारियों के साथ बैठक की। कुल 56 में से 46 अफसर ही इस बैठक में पहुंचे और 10 अफसर गैर हाजिर रहे। लिहाजा सीडीओ ने गैरहाजिर अफसरों का न केवल वेतन रोक दिया, बल्कि उनसे गैरहाजिरी के संबंध में स्पष्टीकरण भी तलब किया है।
सीडीओ एसके सिंह ने बताया कि इन अफसरों को दो-दो गांवों को ओडीएफ घोषित कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इन अफसरों को यह गांव 31 मार्च 2017 तक ओडीएफ घोषित कराने थे, लेकिन अभी तक काफी गांव ओडीएफ घोषित नहीं हो सके हैं। विकास भवन में हुई बैठक में सीडीओ ने इन अफसरों से कहा कि वह अपने गांवों में जाकर देखें कि वहां शौचालयों का निर्माण हो रहा है या नहीं। शौचालयों की कितनी संख्या इन गांवों में है।
निर्माणाधीन शौचालयों पर कितने मजदूर काम कर रहे हैं। उनकी गुणवत्ता और मानक का ख्याल रखा जा रहा है या नहीं। इन सभी बिंदुओं पर रिपोर्ट देने को कहा गया है। सीडीओ ने बताया कि हर हफ्ते इस अभियान की समीक्षा होगी। जिला, ब्लॉक और तहसील स्तरीय अफसरों से ओडीएफ के लिए प्रस्तावित गांवों में जांच कराई जाएगी।
14 प्रधान प्रशासन के निशाने पर
हाथरस। सीडीओ एसके सिंह ने बताया कि अभियान की समीक्षा में शिकायत मिल रही है कि ग्राम प्रधान इसमें सहयोग नहीं कर रहे हैं। ऐसे ग्राम प्रधानों को चिह्नित कर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के निर्देश डीपीआरओ को दिए गए हैं। सीडीओ ने स्पष्ट कहा कि यह केंद्र और प्रदेश सरकार का महत्वाकांक्षी अभियान है। इसके तहत दो अक्तूबर 2018 से पहले ही जिले को ओडीएफ घोषित किया जाना है। प्रमुख सचिव पंचायतराज ने भी इस बारे में सख्त निर्देश जारी किए हैं। सीडीओ ने बताया कि करीब 14 गांवों में शौचालय निर्माण में अनियमितताएं सामने आई हैं। इन गांवों के प्रधान और सचिवों को आखिरी मौका दिया गया है कि वह गबन की गई धनराशि को शौचालय निर्माण में व्यय कर उसका उपभोग प्रमाण पत्र पेश करें, अन्यथा अगली बैठक में उनके खिलाफ विधिक कार्रवाई प्रस्तावित कर दी जाएगी और गबन की गई धनराशि की वसूली भू राजस्व के रूप में करने के भी आदेश दिए जाएंगे।