इतने बड़े बरामदे में 14 बाय नौ इंच के केवल चार कॉलम खड़े किए गए थे। ये कॉलम ईंट के बनाए गए थे। पिलिंथ बीम (फर्श पर बिछा बीम) से केवल एक-एक सरिया निकालकर ईंटों से कॉलम बना दिए गए थे, जबकि पिलिंथ बीम से कॉलम की कम से कम छह सरिया बांधकर आरसीसी का कॉलम कास्ट करना था। डीसी निर्माण दुष्यंत ने बताया कि शटरिंग की बल्ली मिट्टी में धंसने के कारण छत गिरी। यदि कॉलम आरसीसी का होता तो छत का वजन सह लेते। यही हादसा भवन बनने के बाद भी हो सकता था।
तकनीकी स्वीकृति को लेकर संशय
शिक्षा विभाग में बनने वाले ये विद्यालय किसी निर्माणदायी इकाई के द्वारा नहीं बनाए जा रहे। प्रधानाध्यापक व शिक्षा समिति अपने स्तर से मिस्त्री व मजदूरों के भरोसे निर्माण कार्य कराती हैं। इस पर कोई ध्यान नहीं देता कि प्रस्तावित ड्राइंग की तकनीकी स्वीकृति है या नहीं और उसके अनुसार काम हो रहा है या नहीं। यहां भी यही लापरवाही देखने को मिली, बेसिक शिक्षा विभाग के के डीसी निर्माण दुष्यंत गौतम ने बताया कि निर्माण के लिए ड्राइंग उन्हें शासन स्तर से मिली है, जिसकी तकनीकी स्वीकृति उनके स्तर से नहीं ली जाती है। उनका दावा है कि इसी ड्राइंग के अनुसार नगला रमजू में निर्माण कार्य कराया जा रहा था।
सुपरविजन के नाम पर इतिश्री
विद्यालय में हो रहे निर्माण कार्यों में सुपरविजन की बात करें तो शिक्षा विभाग व आरईएस इसके नाम पर केवल इतिश्री कर रहे हैं। हैरानी की बात है कि छत कास्टिंग से पहले जेई ने शटरिंग व जाल को चेक नहीं किया। प्रधानाध्यापक की भी लापरवाही रही कि उन्होंने बिना किसी इंजीनियर की मौजूदगी में छत कास्ट करने की अनुमति दे दी। विद्यालय में छत डालने के समय केवल मिस्त्री व मजदूर थे। पूरी आशंका है कि अन्य विद्यालयों में हो रहे निर्माण कार्यों में भी यही लापरवाही हो रही होगी।