हाथरस। आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) योजना जमीनी स्तर पर तकनीकी समझ और जागरूकता की कमी के कारण सुस्त है। जिला अस्पताल में 95 फीसद ऑनलाइन परचे बनाए जा रहे हैं, लेकिन आभा आईडी लिंक्ड पर्चों की संख्या 15 से 20 फीसदी से पार नहीं जा पा रही। स्वास्थ्य सेवाओं में डिजिटल क्रांति आने में अभी समय लगेगा।
जिला अस्पताल में मंगलवार की सुबह आठ बजे से नौ बजे तक परचा काउंटर पर एबीडीएम के अंतर्गत बनाए जा रहे ऑनलाइन परचों की हकीकत परखी गई। तय समय पर तीनों काउंटर शुरू हुए। आभा आईडी से परचे बनाने के कार्य की मॉनिटरिंग के लिए डाॅ. केके शर्मा बैठे मिले। काउंटर पर पहुंचने वाले हर मरीज या उनके तीमारदार से उनका मोबाइल नंबर या आधार कार्ड नंबर पूछा जा रहा था। प्रयास था कि मोबाइल नंबर से आभा आईडी को फैच कर पर्चा जारी किया जाए।
मोबाइल नंबर मांगने पर अधिकतर मरीज असहज नजर आए। किसी पर मोबाइल नहीं था तो किसी पर आधार कार्ड। एक महिला ने आधार कार्ड दिया तो ओटीपी घर पहुंचा। पूछकर जब ओटीपी डाला तो पता चला कि आभा आभा आईडी बनी ही नहीं है।
एक वृद्धा से आभा आईडी बनवाने के लिए कहा गया तो उन्होंने एक रुपये के साथ की-पैड वाला मोबाइल आगे कर दिया। सभी मरीजों को मोबाइल नंबर देने पर जोर दिया जा रहा था। बहराल एक घंटे की माथा मच्ची में 92 पर्चे बने, जिनमें से केवल 15 ही आभा आईडी लिंक्डथे, जिनका डिजिटिल रिकॉर्ड रखा जा सकता है।
इनका कहना है।
आभा एप डाउनलोड करने के लिए डेडिकेटेड काउंटर बनाया गया है। जिन मरीजों के पास स्मार्ट फोन होते हैं, उनकी आभा आईडी जनरेट कर स्कैनर से टोकन नंबर लेने की जानकारी दी जा रही है। एक हफ्ते में करीब 160 लोगों के मोबाइल में एप डाउनलोड कराया गया। उपलब्ध संसाधनों में आभा आईडी लिंक्ड परचों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
डॉ. सूर्यप्रकाश, सीएमएस