प्रशांत भारती, हाथरस।
हाथरस की हींग को ऊंचे आयामों तक पहुंचाने के लिए व्यापारियों ने तमाम प्रयास किए हैं, लेकिन सरकार की ओर पूरी मदद न मिलने के कारण हींग उद्योग बुलंदियों तक नहीं पहुंच सका। वर्ष 1975 में तो खुद एक उद्यमी ने प्राइवेट लैब तक स्थापित कराई, लेकिन सरकार ने इसकी सुध नहीं ली और 15 साल बाद यह बंद हो गई। वैसे अब सीएम की घोषणा के बाद उद्यमियों को आस है कि यह उद्योग अब काफी विकसित होगा।
जिले में वर्ष 1975 में हींग की टेस्टिंग के लिए लैब की स्थापना की गई थी। यह लैब उद्यमी देवकी नंदन अग्रवाल ने अपनी जगह पर बनवाई और हींग की पैकिंग का काम शुरू किया। इस लैब में हींग की टेस्टिंग शुरू होने के साथ ही यहां के उद्योग में तेजी आने के आसार दिखाई दिए। इस लैब में टेस्टिंग के लिए सप्ताह में दो दिन आगरा से एक तकनीशियन आता था। वह सैंपलों की जांच करके अपनी रिपोर्ट बनाता था।
उसी आधार पर हींग में पदार्थों की मात्रा का निर्धारण करके हींग की पैकिंग की जाती थी। 15 साल तक यह सिलसिला जारी रहा। उसके बाद लैब तकनीशियन ने आना बंद कर दिया और यह लैब भी बंद हो गई। लैब को सुचारु करने के लिए शासन स्तर से मदद नहीं मिल सकी। जिले में फूड टेस्टिंग के लिए लैब बनाए जाने के लिए कई बार उद्योग बंधु की बैठक में प्रस्ताव तैयार हुए। फाइलें भी तैयार की गई, लेकिन योजना को मूर्त रूप नहीं दिया जा सका।
फूड टेस्टिंग लैब बनाने के लिए शासन स्तर से 90 फीसदी अनुदान दिया जाता है। शेष 10 फीसदी का सहयोग व्यापारियों का करना पड़ता है। वहीं हींग एसोसिएशन रजिस्टर्ड न होने के कारण लैब का प्रस्ताव पारित नहीं हो सका है।
रितेश बंसल, सहायक प्रबंधक, डीआईसी