गर्मी में जल संकट और बारिश में बाढ़ से परेशान रहने वाले किसानों के लिए नया संकट खड़ा हो गया है। अचानक गंगा का जलस्तर बढ़ने से नदी के किनारे तैयार सौ बीघा तरबूज की फसल जलमग्न हो गई। किसानों का कहना है कि अमूमन इस मौसम में ऐसा नहीं होता है। इसलिए नदी के किनारे बलुई मिट्टी पर बड़े पैमाने पर तरबूज और खरबूजे की खेती की जाती है। वहीं सिंचाई विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पहाड़ों पर बर्फ पिघलने और बांधों से थोड़े-थोड़े अंतराल मेें पानी गंगा जी में छोड़ा जा रहा है। जिसके कारण फसलें प्रभावित र्हुइं हैं।
क्षेत्र के गांव माहिमपुर के किसान गंगा किनारे बलुई मिट्टी में तरबूज और खरबूजे की खेती करते हैं। बबलू पुत्र गिरजाशंकर, रामस्वरूप पुत्र रामबख्श, रामखेलावन पुत्र लोकनाथ, छम्मीलाल पुत्र लीला, नन्हे पुत्र मूलचंद्र, सियाराम पुत्र रामकुमार समेत दर्जनों किसानों ने नदी के किनारे खेतों में तरबूज की फसल बोई है। एक सप्ताह से धीरे-धीरे नदी का जलस्तर बढ़ रहा है। शुक्रवार और शनिवार को नदी का पानी खेतों तक पहुंच गया, जिससे फसल डूब गई। लगभग सौ बीघा क्षेत्र में खड़ी फसलें बर्बाद हो गईं। किसानों ने बताया कि जैसे-तैसे मवेशियों से बचाकर फसल तैयार की थी, लेकिन गंगा के बढ़े जलस्तर ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया। सिंचाई विभाग के अधिकारियों की माने तो एक, दो दिन में जलस्तर सामान्य हो जाएगा। एसडीएम बिलग्राम सतेंद्र सिंह ने बताया कि इस तरह के मामलों में किसानों को तहसील स्तर से मुआवजा दिलाने का कोई प्रावधान नहीं है।
फसल बीमा के बारे में पता नहीं
मल्लावां। क्षेत्र के किसान फसल बीमा जैसी योजना से पूरी तरह से अंजान है। किसान नन्हें, रामखेलावन व छम्मीलाल आदि ने बताया कि उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है। किसानों ने बताया कि खेत नदी किनारे हैं, जिसके कारण उन्हें साल या दो साल में एक बार ऐसे हालातों का सामना करना पड़ता है।