हरदोई। 100 साल से अधिक तक जीने वाले कछुओं और तालाब की हालत जलकुंभी ने बिगाड़ दी है।
साल 2018-19 में तालाब पर कराए गए काम भी रख-रखाव के अभाव में बेकार हो गए हैं। कभी कछुओं से भरा रहने वाले तालाब को जलकुंभी ने भर दिया है। वहां पर लगवाई गई बेंच और सौर ऊर्जा की लाइटें भी टूट और खराब हो गई हैं। तालाब में जलकुंभी होने के कारण लोगों ने भी तालाब पर कछुओं को देखने के आना कम कर दिया है।
कछुओं की संख्या और लोगों का उनके प्रति लगाव देखते हुए तालाब का साल 2018-19 में सौंदर्यीकरण कराया गया था। कछुआ तालाब तहसील बिलग्राम के ककराखेड़ा गांव में है। गांव से ही सटा तालाब होने के कारण वहां पर हजारों की संख्या में कछुआ होने से तालाब का नाम ही कछुआ तालाब पड़ गया। पशु-पक्षियों और मानव से प्रेम के कारण कछुआ तालाब के बाहर स्वच्छंद होकर विचरण करते रहते हैं।
उस समय तालाब के किनारों को पक्का बनवाने के साथ ही वहां पर आने वाले लोगों के बैठने के लिए बेंच और प्रकाश के सौर ऊर्जा लाइटें लगवाई गई थीं। समय के साथ देखरेख के अभाव में बेंच और लाइटें खराब हो गई हैं। तालाब में घास और जलकुंभी की भरमार है। इससे तालाब के कछुआ इनकी जड़ों में फंस जाते हैं, जिससे कछुओं को विचरण में समस्या आती है। कछुआ तालाब को धरोहर के रूप में संरक्षित किए जाने के साथ ही वहां पर कछुआ हैचरी बनवाए जाने का भी प्रयास किया गया, लेकिन अभी तक साकार नहीं हो सका है।
कछुआ देखने वाले जलकुंभी देख होते निराश
ककराखेड़ा के कछुआ तालाब में कछुआ देखने की हरसत के साथ वहां पर आने वाले लोग तालाब में घास और जलकुंभी देखकर निराश हो जाते हैं। वहां पर आने वाले कछुआ के लिए दाना और खाने की सामग्री भी लाते हैं। कछुए न दिखाई देने से लोग दाना आदि डालकर कछुओं का साथ नहीं पा पाते हैं।
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ककराखेड़ा तालाब को दोबारा से सही स्वरूप में स्थापित कराने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। काम कराए जाने के लिए शासन से बजट की मांग की जानी है। वन विभाग सहित कई विभागों को काम की प्रकृति के अनुसार जिम्मेदारी दी गई है। -मंगला प्रसाद सिंह, जिलाधिकारी