जंगलों का अंधाधुंध कटान होने से पर्यावरण भी
असंतुलित होने लगा है। इसी का असर है कि गौरैया जहां विलुप्त हो गई, वहीं
कोयल के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगा है। कहना गलत न होगा कि पेड़ों के
अंधाधुंध कटान ने न सिर्फ वायुमंडल में जहर घोल दिया है, बल्कि बेजुबान
पक्षियों के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया है।
ज्ञात हो कि वन
विभाग औसतन हर वर्ष 5 से 7 लाख पौधे रोपित कराता है। इसमें 25 से 30 फीसदी
पौधेे सूख जाते हैं और शेष पौधे जो वृक्ष बनते हैं, उससे कहीं ज्यादा वृक्ष
हर साल कट जाते हैं। इसी तरह से जल संचयन के मुख्य वाहक कुएं एवं तालाब पट
चुके हैं।
जिले की कुल 1101 ग्राम पंचायतों में औसतन हर गांव में 10 से 12
कुएं, 4 से 5 ढकुली तथा 2 से तीन चरख एवं 6 से 8 तालाब होते थे, पर अब
इनकी संख्या काफी कम हो गई है। नारा तो सभी लोग देते हैं कि एक वृक्ष को
काटने को पहले चार पौधों को लगाकर उन्हें सींचना चाहिए, पर ऐसा फिलहाल जिले
में होता नहीं दिखा।
यही कारण है कि जिले में सरकारी एवं निजी क्षेत्र की
बागवानी मिलाने के बाद भी हरियाली का क्षेत्रफल कुल क्षेत्रफल करीब 6 लाख
हेक्टेयर का तीन प्रतिशत से भी कम है। उधर, प्रति वर्ष लाखों पौधे रोपित
होने के बाद भी जिले में वन विभाग का हरियाली क्षेत्र महज 11,962 हेक्टेयर
है।
इससे अंदाजा लगाना सहज है कि जिले में पौधरोपण को लेकर संबंधित विभाग
कितना सजग है। डीएफओ रेनू सिंह ने बताया कि जिले में अवैध कटान पर पूरी तरह
से रोक लगाई जाएगी। इस वर्ष वन विभाग का लक्ष्य 384 हेक्टेयर एवं विभागों
सहित कुल 744 हेक्टेयर भूमि पर चार लाख 83 हजार 963 पौधरोपण कराने का है।
समस्त रेंज अफसरों को कटान व वन्य जीवों के जीवन से खिलवाड़ करने वालों के
खिलाफ सख्ती से निपटने के भी निर्देश दिए गए हैं। उधर, वन विभाग की
नियमावली एवं शासन द्वारा पेड़ काटने को परमिट की व्यवस्था लागू करने पर
नजर डाले तो एक पेड़ कटाने को किसानों को दो पौधे लगाने की व्यवस्था लागू
हुई थी।
इसलिए यह प्रावधान किया गया था कि जब कोई व्यक्ति किसी पेड़ को
काटने को परमिट का आवेदन करेगा तो परमिट जारी करते समय उस व्यक्ति से दो
पौधे लगाने की शर्त को पूरा कराने को दो सौ रुपये की एनएससी भी वन विभाग
जमा कराएगा तथा इन एनएससी को उस व्यक्ति को तब लौटाया जाएगा, जब उसके
द्वारा लगाए गए पौधे पूरी तरह से पेड़ बन जाएंगे, पर इस प्रावधान पर भी आरी
चल गई है।