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Hardoi News: एसएनसीयू वार्ड में जाने का रास्ता सकरा, आकस्मिक द्वार है ही नहीं

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हरदोई। मेडिकल कॉलेज से संबद्ध महिला चिकित्सालय के एसएनसीयू वार्ड में अग्नि सुरक्षा के नियमों का पालन नहीं किया गया है। वार्ड में जाने का रास्ता बेहद सकरा है तो आकस्मिक द्वार है ही नहीं। वार्ड के अंदर फायर सेफ्टी अलार्म और वाटर वाल्व भी नहीं है। खास बात यह है कि मेडिकल कॉलेज के जिम्मेदारों का आना-जाना इस वार्ड में हर रोज होता है, लेकिन आकस्मिक स्थिति से निपटने के इंतजामों की ओर ध्यान कभी नहीं दिया जाता।
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दृश्य-1-
एसएनसीयू वार्ड में जाने के लिए यही एक मात्र रास्ता है। जहां से बच्चों के अभिभावकों का आना-जाना होता है और स्टाफ भी इसी द्वार से जाता है। यह इतना संकरा रास्ता है कि इसमें दो व्यक्ति एक साथ नहीं जा सकते हैं। इस द्वार के बाद वार्ड का द्वार भी आता है, वह भी एक सामान्य चौड़ाई वाला है। इसमें एक वक्त में एक ही व्यक्ति अंदर बाहर आ जा सकता है। इतना ही नहीं वार्ड में अन्य कोई आकस्मिक द्वार भी नहीं है।

दृश्य-2-
यह नजारा एसएनसीयू वार्ड के अंदर का है। वार्ड में 12 बेड हैं। कक्ष में स्थान कम होने के कारण 12 बेडों के बीच भी पर्याप्त स्थान नहीं है। इनके बीच इतनी जगह है कि सिर्फ एक व्यक्ति ही खड़ा रह सकता है। शनिवार को हालांकि, यहां 11 बच्चे ही भर्ती हैं और एक बेड खाली है, लेकिन अक्सर ऐसा भी होता है कि यहां एक-एक बेड पर दो-दो बच्चों का इलाज किया जाता है।
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वार्ड में न वाटर वाल्व और न अग्निशमन यंत्र
एसएनसीयू वार्ड के अंदर एक भी अग्निशमन यंत्र नहीं लगे हुए हैं और न ही स्वचालित वाटर वाल्व लगे हुए हैं। हालांकि, वार्ड के बाहर दो अग्निशमन यंत्र लगे हैं, जो अभी बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन अनहोनी की दशा में वार्ड से इतनी दूर लगे अग्निशमन यंत्रों का प्रयोग हो पाना बड़ा मुश्किल है। इतना ही नहीं वाटर हौज वाल्व के पास तो पाइप ही नहीं लगाया गया है।

महिला अस्पताल में हॉज वाल्व के बाक्स में पाइप ही नहीं
मेडिकल कॉलेज से संबद्ध महिला चिकित्सालय में ऑपरेशन थिएटर के पास हॉज वाल्व है, लेकिन इसके बक्से में पानी की आपूर्ति के लिए पाइप ही नहीं है। मतलब यह है कि आपात स्थिति में इसका इस्तेमाल हो ही नहीं पाएगा। भूतल पर लगा अग्निशमन यंत्र देखने में उपयोगी नजर नहीं आता। यंत्र पर रिफिलिंग की पर्ची नहीं लगी है और न ही इस पर कोई मीटर है। इसकी वजह से यह पता भी नहीं चल पाता कि अग्निशमन यंत्र में गैस है भी या नहीं।



अग्निशमन विभाग के अभिलेखों में सब कुछ दुरुस्त
अग्निशमन विभाग के प्रभारी निरीक्षक सुशील कुमार सिंह ने बताया कि सभी व्यावसायिक इमारतों के निर्माण के समय नेशनल बिल्डिंग कोड 2016 का पालन करना अनिवार्य है। आग की सबसे अधिक घटनाएं शार्ट सर्किट की वजह से होती हैं। इसके लिए विद्युत सुरक्षा निदेशालय से भी फायर आडिट कर प्रमाण पत्र लेना आवश्यक है। बताया कि जिले के सरकारी और सभी बड़े प्राइवेट अस्पतालों ने फायर सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन करने की एनओसी ली है। समय-समय पर निरीक्षण कर मॉकड्रिल भी की जाती है और कमी होने पर दिशा निर्देश दिए जाते हैं।


छह माह पहले दी गई नसीहत पर अमल नहीं
अग्निशमन विभाग ने मेडिकल कॉलेज में करीब छह माह पहले अस्पताल में मॉकड्रिल की थी। इस दौरान कुछ कमियां मिली थीं। इसके बाद अग्निशमन यंत्रों को रिफिल कराने, वाटर हॉज वाल्व के पास सेफ्टी बॉक्स में पाइप रखवाने के निर्देश दिए गए थे। बाकायदा पत्र भी मेडिकल कॉलेज प्रशासन को भेजा गया था। फिर भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ।



मेडिकल कॉलेज में फायर सेफ्टी पर करीब दो करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। सुरक्षा के इंतजाम पूरे हैं। अगर कोई कमियां हैं तो उसको दूर किया जाएगा। हाल ही में यहां का कार्यभार संभाला है। एक-एक कर सभी व्यवस्थाओं को दुरुस्त किया जा रहा है। -डॉ. जीवन विष्णु गोगोई, प्राचार्य, मेडिकल कॉलेज
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