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दल-बदल का मन, दोस्त बने दुश्मन

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हरदोई। दल-बदल का मन दोस्तों को सियासी दुश्मन किस कदर बना देता हैै, इसकी बानगी हर चुनाव में देेखने को मिलती है।
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चुनावों से पहले एक ही दल में दिल के साथ मिलने वाले दोस्तों के जब दल बदलते हैं, तो फिर दिल भले न बदले, मगर सियासी दुश्मनी की जंग में शब्दों के बाण एक दूसरे को निशाना बनाते हैं। ऐसी ही एक सियासी जंग की जमीन जिले में एमएलसी चुनाव में तैयार हो चुकी है।
दल-बदल से दोस्ती के बीच सियासी दरार तो पहले ही पड़ चुकी थी, मगर अब एमएलसी चुनाव की रणभेरी बजने के साथ ही टिकट फाइनल होते ही सियासी जंग में दो दोस्तों का सीधे आमना-सामना होगा।
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यह दो दोस्त हैं भाजपा नेता पूर्व सांसद नरेश अग्रवाल और सपा नेता एमएलसी मिसस्वाहुद़दीन जिनकी दोस्ती की चर्चा संडीला में ही नहीं पूरे जिले में एक जमाने से होती रही है। 1
974 मेें पहली बार अपने गांव गुसवाडौड़ा की न्याय पंचायत मलैया के सरपंच बने मिस्वाहुद़ीन 1983 में से 2010 तक लगातार जिला पंचायत सदस्य रहे। इस दौरान उनकी जिले की राजनीति के केंद्र बिंदु रहने वाले पूर्व कैबिनेट मंत्री नरेश अग्रवाल से दोस्ती हुई।
दोस्ती इतनी गाढ़ी हुई कि जब नरेश के छोटे भाई मुकेश अग्रवाल जिला पंचायत अध्यक्ष बने तो मिस्वाहुद्दीन को जिला पंचायत का उपाध्यक्ष बनाया गया था।
परिवहन मंत्री रहने के दौरान नरेश ने उन्हें निगम में डायरेक्टर भी बनवाया। संडीला क्षेत्र में मिस्वाहुद्दीन नरेश के सबसे अहम साथी रहे। नरेश से दोस्ती उनकी कितनी गहरी रही है,
इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता कि अपने निकटतम साथी राजकुमार अग्रवाल को 2001 के स्थानीय निकाय क्षेत्र से एमएलसी बनवाने वाले नरेश ने 2016 के चुनाव में सपा से मिस्वाहुद्दीन की पैरवी की और उन्हें एमएलसी बनवाने में अहम भूमिका निभाई।
दोनों की दोस्ती सालों पुरानी है, लेकिन 2018 में जब पूर्व सांसद नरेश का सपा से राज्य सभा टिकट कट गया तो वह भाजपा में शामिल हो गए और उनके भाजपा में जाने के बाद पहली बार मिस्वाहुद्दीन ने उनसे सियासी दूरी बना ली।
सियासत में इन दोनों के बीच की दूरी अब एमएलसी चुनाव में सियासी जंग के रूप में आमने सामने हो सकती है, क्योंकि सपा से आने वाले प्रत्याशी की चुनावी डोर सिंटिंग एमएलसी के नाते सपा मिस्स्वाहुददीन को दे सकती,
तो भाजपा नरेश के राजनीतिक कद एवं प्रभाव को देखते हुए एमएलसी चुनाव की डोर उन्हें सौंप सकती है, ऐसे में कभी दोस्त रहे दो नेता सियासी जंग में एक दूसरे के सामने सियासी दुश्मन बन अपनी अपनी पार्टी के लिए लड़ते नजर आ सकते हैं।
तो पिता नहीं बेटा लड़ेगा एमएलसी चुनाव
एमएलसी की इस सीट से सपा के सिटिंग एमएलसी मिस्वाहुद्दीन है। सपाइयों का मानना है कि पार्टी सिटिंग एमएलसी पर ही फिर से दांव लगाना चाहेगी लेकिन मिस्वाहुद्दीन के खेमे का कहना है कि वह इस बार चुनाव नहीं लड़ना चाहते हैं।
65 वर्ष से अधिक उम्र के हो चुके मिस्वाहुद्दीन बेटे रजीउद्दीन को चुनाव लड़ाना चाहते हैं। रजीउद्दीन जिला पंचायत सदस्य रह चुके हैं और पिता का राजनीतिक कामकाज भी संभालते रहे हैं।
इस बाबत एमएलसी ने बताया कि यह सही है कि वह चुनाव नहीं लड़ना चाहते और सपा से बेटे रजीउद्दीन के लिए टिकट मांग रहे हैं। जिला संगठन से लेकर पार्टी हाईकमान तक उनकी बात हुई है।
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नरेश से दोस्ती के सवाल पर कहा कि दल बदल चुके हैं और वो अपनी पार्टी के लिए काम रहे हैं। हम अपनी पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। सियासत में कोई किसी का स्थायी दोस्त या स्थायी दुश्मन नहीं होता।
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