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अनाथ सुन डाक्टर ने नहीं लगाया हाथ

Fri, 01 Jul 2016 12:07 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/हरदोई
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बच्ची को गोद लिए महिला साथ में पति। - फोटो : अमर उजाला
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हरदोई। जिला अस्पताल की पंगु व्यवस्था और डाक्टरों के मानवताहीन दृष्टिकोण ने गुरुवार को मासूम की जान ले ली। अनाथ सुनकर डाक्टरों ने हाथ तक नहीं लगाया और पोषण पुनर्वास केंद्र भेजे जाने की सलाह दे डाली।
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माधौगंज के कब्रिस्तान में बच्ची के मिलने से लेकर साढ़े छह घंटे बाद हुई मौत तक सबसे कटु अनुभव जिला चिकित्सालय के इमरजेंसी रूम में ही हुआ। अनाथ बताते ही डाक्टर ने उसे पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराने को कह डाला और हाथ तक नहीं लगाया। डाक्टरों की इस संवेदनहीनता की हर जगह भर्त्सना होती रही। अगर डाक्टरों ने सक्रियता दिखाई होती तो शायद वह नन्ही जान सबके बीच होती।

गंभीर देख तुरंत करते लखनऊ रेफर
हरदोई। नन्हीं जान के दम तोड़ने वाले प्रकरण ने जिला चिकित्सालय की इस नियति से पर्दा उठा दिया है कि मलहम पट्टी की नौबत हो तो यहां हो सकती है लेकिन गंभीर इलाज की जरूरत हो तो लखनऊ रेफर कर दिए जाते हैं। कुल मिलाकर आराम में डाक्टरों को किसी प्रकार की खलल न पड़े। सिर्फ रात में इमरजेंसी के वक्त ही नहीं सुबह, दोपहर व शाम को भी इमरजेंसी में प्राथमिक उपचार को लेकर पहुंचने वाले लोगों का तो यहां इलाज संभव है लेकिन गंभीर मरीज को तुरंत लखनऊ रेफर कर दिया जाता है। एक अनुमान के मुताबिक जिला चिकित्सालय में गंभीर अवस्था में दूसरा व तीसरा रोगी लखनऊ रेफर कर दिया जाता है।
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जिले में कहीं नहीं है नियोनेटर केयर यूनिट
हरदोई। कहने को तो हरदोई में दो जिलास्तरीय अस्पताल हैं लेकिन किसी में भी गंभीर रूप से बीमार नवजात के इलाज की व्यवस्था नहीं है। नवजात को ऐसी हालत में नियोनेटर केयर यूनिट की जरूरत होती है। ये यूनिट निजी अस्पतालों तक में नहीं है। गंभीर बीमार बच्चों को 110 किलोमीटर दूर लखनऊ या फिर 145 किलोमीटर दूर कानपुर ले जाना पड़ता है। ऐसे में ज्यादातर नवजात दम तोड़ देते हैं।

सीएमएस डा. आरके मिश्रा ने बताया कि जिला अस्पताल में दो नियोनेटर केयर यूनिट के लिए कई बार शासन को प्रस्ताव भेजे गए लेकिन मंजूरी नहीं मिली। अगर नियोनेटर केयर यूनिट होता तो शायद बच्ची की जान बच जाती। गंभीर हालत के नवजात को लखनऊ रेफर कर दिया जाता है। जिला अस्पताल को छोड़कर शहर में छह से अधिक बड़े नर्सिंग होम हैं। ये नर्सिंग होम कहने को तो नवजात और बच्चों के बेहतर इलाज का दावा तो करते हैं लेकिन उनके पास भी नियोनेटर केयर यूनिट नहीं है।

निजी डॉक्टरों का कहना है कि नियोनेटर केयर यूनिट का संचालन बहुत महंगा पड़ता है। उसके लिए डॉक्टर से लेकर अलग स्टाफ की भी जरूरत होती है। यहां के निजी अस्पतालों में रिएडेंट वार्मर से ही काम चलाया जाता है।


डीएम से कराएंगे मामले की जांच : नितिन
सदर विधायक और प्रदेश सरकार में मंत्री नितिन अग्रवाल ने कहा कि महिला अस्पताल में ही बच्ची को भर्ती किया जाना चाहिए था। अगर वह जिला संयुक्त अस्पताल पहुंच ही गई थी तो सीएसएस की जिम्मेदारी बनती है कि उसे इमरजेंसी में ही पूरा इलाज मुहैया कराते। अगर बच्ची को अस्पताल में वार्ड दर वार्ड भटकाया गया तो ये गंभीर लापरवाही है। मैं डीएम से इसकी जांच कराऊंगा और जांच रिपोर्ट के आधार पर प्रमुख सचिव स्वास्थ्य से दोषी डॉक्टरों पर कार्रवाई कराई जाएगी। मैं जब स्वास्थ्य मंत्री था तो जापानी बुखार से बच्चों को बचाने के लिए दो विशेष यूनिट दिलवाई थी, इसका बजट भी जारी हो गया था उसके बाद मेरा विभाग बदल गया। यूनिट बनी या नहीं इसे दिखवाऊंगा।

गैर ने सांसें चलने तक दिया आंचल
हरदोई। नौ माह कोख में रखकर चंद सांसें जीवन की देने के बाद ही जहां एक मां कुमाता बनकर नन्ही जान को कब्रिस्तान में छोड़ गई तो गैर कब्रिस्तान से लेकर उसकी आखिरी सांस चलने तक सीने से लगाए रही। नन्ही बच्ची के दम तोड़ने के बाद मां के इन दो रूपों की चर्चा होती रही। एक मां ने अपने ही कलेजे के टुकड़े को कब्रिस्तान के हवाले कर दिया। वहीं बच्ची के पड़े होने की सूचना मात्र से ही गांव परनगा निवासी विवेक की पत्नी अंजली मौके पर पहुंच गई और उसे सीने से लगा लिया। वहां से सीएचसी और उसके बाद जिला चिकित्सालय आने पर भी वह उसे गोद में लिए रही। यही नहीं उसके बच जाने की प्रार्थनाएं भी वह हर दम ईश्वर से करती रही। उसकी मौत के बाद हर किसी की जुबान पर जहां गैर होने के बाद भी अंजली जैसी मां का नाम जुबान पर रहा वहीं इस मासूम को कब्रिस्तान में छोड़ने वाली मां को भी कहीं न कहीं बददुआ मिलती रही।
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