कई वर्षों की आस और प्रयास के बाद करीब चार साल पहले
जिले को मिला रसखान प्रेक्षागृह रखरखाव और प्रबंधन में उदासीनता के दबाव
में कराह रहा है। बदहाल हो रहे इस प्रेक्षागृह से तमाम सपने और इरादे जुड़े
हुए है। जिम्मेदारों को आईना दिखाता प्रेक्षागृह आज भी प्रबंधतंत्र की राह
देख राह देख रहा है।
ज्ञात हो कि लोकार्पण के करीब चार वर्षों बाद भी
प्रेक्षाग्रह का हस्तांतरण किसी विभाग और संस्था को नहीं हो सका है। ज्ञात
हो कि वर्ष 1990 के दशक में शहर में प्रेक्षागृह के सपनों को साकार करने
को शुरू हुई रंगकर्मियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की मुहिम को इसी दशक में
प्रेक्षागृह की नींव रखने से मुकाम मिलता नजर आ गया।
उस समय करीब 50 लाख
की लागत से निर्माण प्रस्तावित किया गया। उसके बाद करीब 12वर्र्षों बाद तक
प्रेक्षागृह के भवन का निर्माण कभी लागत बढ़ने से कभी बजट न मिलने से आधा
अधूरा पड़ा रहा। प्रदेश के संस्कृति विभाग के तत्वावधान में निर्मित होने
वाले इस प्रेक्षागृह का निर्माण पूरा होकर शुभारंभ के लिए रंगकर्मियों एवं
सामाजिक कार्यकर्ताओं ने काफी समय तक आवाज बुलंद की, पर साल दर साल
प्रेक्षागृह आधा अधूरा पड़ा रहा।
वर्ष 10 में जब तत्कालीन डीएम एके सिंह
राठौर ने प्रेक्षागृह का निर्माण पूरा कराने को प्रयास किए। उनके प्रयास
रंग लाए और वर्ष 11 में लोकार्पण होने के साथ ही शासन ने नामकरण भी कर
रसखान प्रेक्षागृह कर जिले को समर्पित कर दिया, पर प्रेक्षागृह पर बदहाली
एवं अव्यवस्थाओं का साया पड़ चुका है।
सफाई से लेकर प्रेक्षागृह में लगे
इलेक्ट्रानिक एवं इलेेक्ट्रिक उपकरणों से लेकर अन्य चीजों को जंग लग रही
है। जिम्मेदारों को इसकी कोई परवाह नहीं है। आम लोगों के लिए बने
प्रेक्षागृह को आम लोगों से ही अलगाव होता जा रहा है। किसी विभाग एवं
संस्था को हस्तांतरण करने से लेकर उपयोग एवं किराए संबंधी कोई स्पष्ट नीति
नहीं बनी है, जिससे प्रबंधन रूपी बागवान नहीं मिल पा रहा है।
जिला
प्रशासन के अफसरों के निर्देश पर आवंटित होने वाले प्रेक्षागृह को आदर्श
एवं व्यवस्थित बनाने की तस्वीर फिलहाल धुंधली है। उधर, सांसद नरेश अग्रवाल व
राज्यमंत्री नितिन अग्रवाल भी प्रेेक्षागृह को वातानुकूलित कराने का वादा
कर चुके हैं, पर तकनीकी कारणों से वादा पूरा होता नजर नहीं आ रहा।