रामलीला कमेटी के ऐतिहासिक मुशायरे में पूरी रात लोग
देश के नामचीन शायरों के कलाम का आनंद उठाते रहे। देश में व्याप्त
भ्रष्टाचार और मूल्यों में आ रही गिरावट के साथ शायरों ने महबूब के लबों
रुखसार को भी शायरी का हिस्सा बनाया।
जस्टिस सईदुज्जमां की अध्यक्षता
में हुए मुशायरे में प्रसिद्ध शायर प्रोफेसर वसीम बरेलवी और फिल्मी नगमा
निगार शकील आजम को पसंद किया गया। वसीम साहब ने अपने इन मिसरों पर भरपूर
तारीफें हासिल कीं ‘खुशी का वादा सभी से किया गया है, तो फिर मेरे लबों को
भी थोड़ी बहुत हंसी तो मिले, तेरे चराग के बारे में मैं भी बात करूं, मगर
मुझे मेरे हिस्से की रोशनी तो मिले’।
मुंबई से आए शकील आजमी की नज्म को
बेहद पसंद किया गया। उनकी गजल का ये शेर बार बार सुनाया गया ‘मैं सो रहा
हूं तेरे ख्वाब देखने के लिए, खुदा करे मेरी आंखों में रात रह जाए’। सुनील
कुमार तंग ने हास्य व्यंग्य की शायरी पेश की ‘वफादारी का ये आलम कि सब
कुत्ता समझते हैं, यही सब सोच कर मैं भी वफादारी नहीं करता।’
उनके इस
शेर पर भी तालियां बजीं ‘पूजा में मेरा ध्यान लगा था ये झूठ है, मुड़ मुड़
के ये देखता था कि चप्पल किधर गईं’। अलीना इतरत के इस शेर ‘बाद मुद्दत मुझे
नींद आई बड़े चैन की नींद, खाक जब ओढ़ ली जब खाक बिछा ली मैंने’ को दाद
मिली।
दिल्ली से आए इकबाल अशहर को ‘किसी दीवाने से कम नहीं है ये मेरे अंदर
का आदमी भी, इधर मैं फूलोें की छांव में हूं, उधर वो कांटों पे चल रहा है’
को दाद मिली। डा. कलीम कैसर ने जिंदगी की तल्ख हकीकत को चार मिसरोें में
इन पेश किया ‘अगर टूटा हुआ चश्मा मेरा बनवा दिया होता, तो मैं अच्छा शगुन
अच्छा मुहूर्त देख सकती थी, मुझे कब शौक दुनिया देखने का था मेरे बेटे, मगर
चश्मा लगाकर मैं तेरी सूरत देख सकती थी’।
मंजर भोपाली ने सियासतदानों
पर तंज कसा ‘वादे ही वादे उन्हीं वादों पे फिर से वादे, जिंदगी बीत गई
तुमको तमाशा करते’। ताहिर फराज ने गजल सुनाई ‘हम किसी और से मनसूब हुए,
क्या ये नुकसान तुम्हारा न हुआ’। संचालक नदीम फर्रूख ने कहा ‘जब भी बिछाई
वक्त ने शतरंज की बिसात, पैदल को शाह, शाह को पैदल बना दिया’।
मुशायरे में
जिला पंचायत के पूर्व अध्यक्ष मुकेश अग्रवाल, खालिद गौरी, समाजसेवी अरुणेश
बाजपेई, पूर्व चेयरमैन रामप्रकाश शुक्ला, हाजी वसीम, गुफरान मियां व दानिश
किरमानी आदि मौजूद थे।