हरदोई। मानस मर्मज्ञ पं. भइयालाल शुक्ल ने कहा कि प्रभु और गुरु का स्मरण करने से सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। उन्होंने श्रीराम की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि त्याग का नाम राम है जहां त्याग है वहां रामराज्य है। वह गुरुवार को बैटगंज स्थित देवी मंदिर प्रांगण में श्री राम कथा सुना रहे थे।
आचार्य ने कहा कि त्याग की भावना होनी चाहिए, भगवान राम में त्याग था उन्होंने सब त्यागा। लक्ष्मण और सीता ने त्याग किया, धर्म के लिए राम के साथ चल दिए। अयोध्या कांड में सब जगह त्याग ही त्याग है। उन्होंने कहा कि दुख के समय को भूलना नहीं चाहिए यदि भूल गए तो अहंकार आ जाएगा। याद रखोगे तो अहंकार नहीं आएगा।
प्रभु राम के चौदह वर्ष के वनवास के दौरान त्याग ही त्याग है। परमात्मा में जो आनंद है वह परिपूर्ण है। भगवान ने सिर्फ मानव को हंसने मुस्कराने का अवसर दिया। मनुष्य हंसता रहेगा तो स्वस्थ भी रहेगा। प्रसन्नता से रोग कम हो जाता है। संसार में आए तो कुछ लेकर नहीं आए थे जब जाओगे तो कुछ लेकर नहीं जाओगे। अंतिम समय ईश्वर की याद आनी चाहिए लेकिन उस वक्त जीवन में जो कमाया है उसकी याद आती है। लेकिन यह न भूलें कि जो कुछ है वह भगवान का स्वरूप है।
भक्त हमेशा भगवान की चर्चा करता है। मेरे भगवान हैं और मैं भगवान का हूं। देवता चाहते थे कि राम को वनवास हो जाए। सरस्वती ने कैकेयी व मंथरा की बुद्धि भ्रष्ट कर दी। मंथरा की सलाह पर कैकेयी कोप भवन मेें लेट गईं और राजा दशरथ से दो वचन मांगें। राजा, कैकेयी के वश में हो गए और दोनों वचन दे दिए। पहला वरदान भरत का राजतिलक और दूसरा वरदान राम को चौदह वर्ष का वनवास मांगा। राजा दशरथ ने धर्म की रक्षा के लिए दोनों वचन पूरे किए।
इस अवसर पर प्रमुख रूप से संजय अवस्थी, हरिशंकर गुप्ता, नंदकिशोर पांडेय, अर्वेश सिंह, राममोहिनी गुप्ता, बीना गुप्ता, सरोज ओमर, नीलम ओमर, कुमुद गुप्ता, रेनू, सुमन ओमर, रिचा ओमर, रामऔतार शुक्ला, विजय गुप्ता, देववृत आदि प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।