नुमाइश मैदान में चल रहे श्रीराम लीला मंचन कार्यक्रम
में शुक्रवार को कलाकारों ने नारद मोह भंग प्रसंग के अंतिम भाग का मंचन
करते हुए कैसे नारद भगवान विष्णु से सुंदर रूप पाने की इच्छा करने के बाद
विश्वमोहिनी से ब्याह रचाने जाते हैं और सुंदर रूप की जगह बानर रू प देने
को हुए उपहास से क्रोधित होकर भगवान विष्णु को पत्नी वियोग का श्राप दे
देते हैं।
गोविंद गोपाल लीला संस्थान के निर्देशक कन्हैयालाल
दत्तात्रेय एवं विष्णु लाल दत्तात्रेय के संयोजन कलाकारों ने लीला का मंचन
किया। नारद मोह भंग प्रसंग के मंचन में दिखाया गया कि विश्व मोहिनी को मन
में बसाकर नारद भगवान विष्णु के पास पहुंचते हैं और उनसे विश्व मोहिनी के
बारे में अवगत कराते हैं।
वह बताते हैं कि विश्व मोहिनी बहुत सुंदर है और
मैं उससे विवाह करना चाहता हूं, इसलिए आप मुझे अपना अर्थात हरि रूप प्रदान
करें। नारद जी कहते हैं जेहि विधि होई नाथ हित मोरा करो सुवेगि दास मंह
तोरा अर्थात प्रभु मैं तो आपका दास हूं और आपको मेरा हित करना होगा। यह
कहकर प्रभु उन्हें हरि रूप प्रदान कर देते हैं, पर प्रभु विष्णु उन्हें हरि
अर्थात बंदर का रूप दे देते हैं।
इसे पाकर अनभिज्ञता स्वरूप वह स्वयंवर
में पहुंच जाते हैं, जहां उनका काफी उपहास होता है। बाद में वह अपना मुख
पानी में देखते हैं, तो पहले शंकर के गणों को श्राप देते हैं फिर विष्णु पर
क्रोधित होकर उन्हें श्राप दे देते हैं कि जिस प्रकार मैं पत्नी वियोग से
तड़प रहा हूं उसी प्रकार आप भी पत्नी वियोग से भटकेंगे।
नारद जी श्राप तो
दे देते हैं, पर बाद में समझाने पर उन्हें गलती का अहसास होता है और पूरी
लीला का ज्ञान होता है। जिसके बाद वह क्षमा मांग लेते हैं, पर यही श्राप
फलीभूत होता है और रामावतार में सीता जी के हरण के बाद वह कई वर्षों तक
पत्नी वियोग सहन करते हैं।