मौसम के मिजाज अपनी रंगत में हैं। पारे का स्तर 40
डिग्री सेल्सियस के आसपास चल रहा है, जिससे धरती तपने के साथ जलस्तर खिसक
रहा है। गर्मी के चलते पेयजल की मांग बढ़ी हुई है। आम जनमानस के साथ ही
पशु-पक्षियों की प्यास बढ़ी हुई है।
हालांकि, गाहे बगाहे अंधड़ चलने और
बूंदाबांदी होने से गर्मी से राहत के साथ पारे का स्तर भी 35 से 38 के
आसपास आ जाता है, पर तेज धूप से प्यास कम नहीं हो पा रही है। इसके अलावा
नगर क्षेत्रों से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां अधिकतर कुएं पट चुके
हैं, तो तालाब सूख चुके हैं और हैंडपंपों से सांय सांय की आवाज के साथ बालू
निकलने लगी है।
यह आलम तब है, जब अभी मई माह चल रहा है और जून माह में जब
गर्मी अपनी प्रचंड रंगत में होगी तो साफ है कि पेयजल की मांग और बढ़ेगी, तब
तपती दोपहरी के साथ उमस लोगों की प्यास और बढ़ाने के साथ परेशानी का कारण
बनेगी। साथ ही पेयजल की समस्या बढ़ सकती है।
इसके बावजूद हैंडपंपों को
दुरुस्त करने एवं तालाबाें में पानी भरवाने को जलनिगम से लेकर प्रशासन के
जिम्मेदार बेखबर बने हुए हैं। ज्ञात हो कि 40 लाख से अधिक आबादी वाले इस
जिले में जल निगम के 46,672 हैंडपंप स्थापित हैं। आंकड़ों के अनुसार,
जिले में करीब 85 लोगों के बीच एक सरकारी हैंडपंप लगा हुआ है।
यह अलग बात
है कि जमीनी हकीकत पर कितने हैंडपंप लगे हुए हैं, इसका प्रमाण जमीनी
सत्यापन से ही हो सकता है। जिले में हजारों हैंडपंप लगने के बाद भी गरीबों
के लिए आसानी के साथ पेयजल मिलना ख्वाब बना हुआ है। यही कारण है कि गर्मी
के मौसम में जब खराब गुणवत्ता की पोल खुलती है और हैंडपंप दगा देते हैं, तो
आम लोगों के लिए दिक्कतें शुरू हो जाती है।
ज्ञात हो कि कुओं का अस्तित्व
लगभग समाप्त हो चुका है और ऐसे में हैंडपंप ही पेयजल के लिए सबसे सुलभ एवं
आसान माध्यम है, पर हर साल बड़ी तादाद में खराब होेने वाले हैंडपंपों के
प्रति होने वाली लापरवाही गर्मी के मौसम में लोगों को मुश्किल में डाल देती
है।
सूत्रों की मानें तो जिलेभर में 2 से 3 हजार हैंडपंप खराब पड़े हुए
हैं और जिम्मेदार बेेखबर हैं। जिले के करीब 22 सौ तालाबों एवं पोखरों में
50 फीसदी से अधिक तालाबों में पानी नहीं है और उनकी तलहटी दिखाई पड़ने लगी
है।