हरदोई। किशोर की हत्या के सात साल पुराने मामले में अपर जिला जज (कोर्ट संख्या-14 पॉक्सो एक्ट) दिनेश गौड़ ने एक शख्स को दोषी करार दिया और हत्या और साक्ष्य छिपाने का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही 12,500 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। मामले में अभियोजन पक्ष किशोर के साथ दुष्कर्म और पॉस्को एक्ट के आरोपों को साबित नहीं कर सका। अदालत ने दोषी को दुष्कर्म और पॉक्सो के आरोपों से बरी किया है।
अरवल थाना क्षेत्र के एक गांव निवासी ग्रामीण ने प्राथमिकी दर्ज कराई थी। बताया था कि 27 जून 2019 की दोपहर एक बजे उसका पुत्र (15) मवेशी चराने के लिए गांव के बाहर बरसाती नाले के पास गया था। मवेशी घर वापस आ गए थे, लेकिन वह नहीं आया। कुछ पता न चलने पर गुमशुदगी दर्ज कराई थी।
30 जून की शाम पुत्र का अर्द्धनग्न शव नाले के किनारे से बरामद हुआ था। शव गल चुका था और गले में दुपट्टा कसा था। घटना वाले दिन उसे गांव के ही बबलू के साथ देखा गया था। पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या और साक्ष्य मिटाने की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की थी। पोस्टमार्टम में गले पर चोट का निशान मिला था और हड्डी भी टूटी थी। मौत का कारण गला घोटे जाने के कारण दम घुटना बताया गया था।
विवेचना में बबलू का नाम सामने आने पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया था। दुष्कर्म और पाक्सो की धाराएं भी बढ़ा दी थीं। अभियोजन पक्ष की ओर से सात गवाहों और 18 अभिलेखीय साक्ष्य पेश किए गए। दोनों पक्षों के तर्को को सुनने व पत्रावली पर मौजूद सबूतों के आधार पर अपर जिला जज ने हत्या और सबूत मिटाने का दोषी मानते हुए सजा सुनाई है।
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शव हो गया था पुराना, स्पष्ट नहीं हुई दुष्कर्म की बात
अदालत में अभियोजन ने सात गवाह पेश किए। घटना के करीब एक घंटा पहले गांव के अलवर ने बबलू को किशोर के साथ देखा था। कोर्ट में बताया कि बबलू अपने साथ किशोर को घटना के एक घंटे पहले झाड़ियों में ले गया था। किशोर के चिल्लाने की भी आवाज आई थी। बचाव पक्ष ने शव के अत्यधिक क्षत विक्षत हो जाने, गवाह के रिश्तेदार होने और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर सवाल उठाए। अदालत ने माना कि गवाह ने अंतिम बार किशोर को दोषी के साथ देखा था। परिस्थितियों की कड़ियां आपस में जुड़ती हैं। अभियुक्त के अपराध की ओर स्पष्ट संकेत करती हैं। अभियुक्त भी यह स्पष्ट नहीं कर सका कि वह किशोर से कब और कहां अलग हुआ था। शव तीन दिन बाद बरामद हुआ और तब तक शरीर काफी क्षतविक्षत हो चुका था। पोस्टमार्टम में दुष्कर्म का स्पष्ट चिकित्सीय साक्ष्य नहीं मिला। ऐसे में केवल परिस्थितियों के आधार पर दुष्कर्म और पाक्सो के आरोप सिद्ध नहीं माने जा सकते। अदालत ने इसी आधार पर बबलू को इन आरोपों से बरी किया है।