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‘आतंक खत्म करने आया इस्लाम’

Sat, 18 Apr 2015 12:27 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हरदोई
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मदरसा रहमानिया लोहानी के जलसा-ए-दस्तारबंदी में मशहूर उलमा-ए-कराम का खिताब हुआ। दारुल उलूम नदवतुल उलमा लखनऊ के प्रबंधक व इंटीग्रल यूनीवर्सिटी लखनऊ के चांसलर मौलाना सईदुर्रहमान आजमी ने गैर कौमों से प्रभावित हुए बगैर दीनी दायरे में जीवन जीने का पैगाम दिया।
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आतंकवाद और इस्लाम को अलग-अलग बताते हुए मौलाना ने कहा कि आतंकवाद के खात्मे के  लिए ही इस्लाम आया है। इस्लाम को दहशतगर्दी से जोड़ने वाले झूठे हैं। जामिया कासमिया दारुल उलूम जकरिया मुरादाबाद के संस्थापक मौलाना सालिम कासमी के संरक्षण में हुए कार्यक्रम में मौलाना सईदुर्रहमान आजमी ने कहा कि जिनका सिर अल्लाह के आगे झुकता है, उन्हेें जालिमों के आगे झुकने की जरूरत नहीं।

सारी दुनिया इस्लाम और इसके मानने वालों से खफा और खौफजदा है। यह एक साजिश का नतीजा है। वह दीन जिसे पूरी दुनिया के लिए रहमत बनकर आए रसूल लेकर आए थे, उससे आखिर क्यों लोग खौफजदा हैं। पश्चिम देशों और मीडिया ने इस्लाम की गलत तस्वीर पेश की है।
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जो दीन दहशतगर्दी को मिटाने आया, उसे ही दहशतगर्दी से जोड़ कर रख दिया गया। खौफजदा लोग अब मुस्लिमों की नसबंदी की बात कर रहे हैं। जरूरत है कि हम इस्लाम की सही तस्वीर को दुनिया के सामने लाएं। नबी की तालीम को आम करें, इस पर अमल कर के दुनिया में शांति की स्थापना करें।

लोगों को अच्छाई से रोक कर भलाई के रास्ते पर लाने की अपनी जिम्मेदारी निभाने को अब फिक्रमंद हो जाना चाहिए। एक मुस्लिम के लिए जरूरी है कि हराम-हलाल की तमीज रखे। महिलाओं को भी दीनी तालीम दिलाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। महिलाओं में दीन होगा, तो घर नमूना-ए-जन्नत बन जाएंगे।

इससे पहले दारुल उलूम देवबंद के उस्ताद मौलाना खिज्र मोहम्मद कश्मीरी ने कलमे की अहमियत पर चर्चा करते हुए कहा कि यह हमें एक सूत्र में पिरोने का काम करता है। हमें चाहिए कि कलमा-ए-तैयबा की अपेक्षाओं को पूरा करने वाले बनें। दारुल उलूम देवबंद के उस्ताद मौलाना मुनीरुद्दीन ने कहा कि कुरान हिदायत वाली किताब है। इसमें खैर है।

कहा कि अर्थ जानकर कुरानी तालीमात को जिंदगी में उतारें। कार्यक्रम में जामिया अरबिया जामा मस्जिद अमरोहा के मुफ्ती रियासत अली व शेखुल हदीस मौलाना अफजालुर्रहमान ने भी तकरीर की। कारी अल्ताफ ने तिलावते कुरान के साथ शुरुआत की। अहमद अब्दुल्लाह ने नातो मनकबत के शेर पढ़े।
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