फोटो- 04- मेडिकल कॉलेज स्थिति आईसीयू वार्ड। संवाद
हरदोई। मेडिकल कॉलेज के वेंटिलेटरों को भी सांसों की दरकार है। पिछले नौ महीने में वेंटिलेटरों के इस्तेमाल को लेकर हालात नहीं बदले लेकिन जिम्मेदारों के बयान जरूर बदल गए। कम से कम आईसीयू में वेंटिलेटरों का इस्तेमाल सुनिश्चित कराने का दावा करने वाले मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य अब इनके इस्तेमाल में तकनीकी समस्याएं बताने लगे हैं। वेंटिलेटर चलाने के लिए प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मी अब भी नहीं हैं। इससे इतर अब दावा यह भी है कि प्लांट से उतनी ऑक्सीजन (प्रेशर) नहीं मिल पा रही जिससे वेंटिलेटर चलाए जा सकें।
मेडिकल कॉलेज स्थापित होने के बाद स्वास्थ्य सेवाओं में बेहतरी की उम्मीद हर बाशिंदे को थी। कुछ हद तक उम्मीद पूरी भी हुई लेकिन ज्यादातर उम्मीदों पर पानी फिर गया। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान वर्ष 2021 में पीएम केयर फंड से जिले को 39 पोर्टेबल वेंटिलेटर मिले थे। तब एक वेंटिलेटर पर लगभग पौने दो लाख रुपये खर्च हुए थे। कोरोना के दौरान कुछ दिनों तक जैसे-तैसे वेंटिलेटरों का इस्तेमाल किया गया और बाद में इन्हें एक हॉल में बंद कर दिया गया, आठ वेंटिलेटर और मंगवाए गए थे।
इस लिहाज से देखें तो मेडिकल कॉलेज में कुल 47 वेंटिलेटर हैं लेकिन इनमें से एक का भी इस्तेमाल नहीं हो रहा। गंभीर मरीजों के लिए वेंटिलेटर सबसे महत्वपूर्ण उपकरण माना जाता है। जिन मरीजों को वेंटिलेटर की जरूरत होती है उन्हें तत्काल ही लखनऊ रेफर कर जिम्मेदार पल्ला झाड़ लेते हैं।
बीते नवंबर में
अमर उजाला ने इस मुद्दे पर सवाल उठाया तो मेडिकल कॉलेज के प्रधानाचार्य डॉ. जेबी गोगोई ने दावा किया कि सभी वेंटिलेटर चला पाना मुश्किल है लेकिन आईसीयू में कम से कम दो वेंटिलेटर चालू करा दिए जाएंगे। नवंबर के बाद अब जुलाई भी खत्म होने की तरफ बढ़ रही है लेकिन वेंटिलेटर खुद ही वेंटिलेटर पर हैं।
नहीं मिल रहा ऑक्सीजन प्रेशर
मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन प्लांट हैं लेकिन यह वेंटिलेटर को आवश्यक दबाव की ऑक्सीजन सप्लाई नहीं कर पा रहे हैं। इंजीनियर आशुतोष राय का कहना है कि वेंटिलेटर को ठीक से काम करने के लिए ऑक्सीजन सप्लाई का प्रेशर 50 से 65 पीएसआई (4.5 से 5 बार या 0.4 से 0.5 एमपीए) के बीच होना चाहिए। इससे कम पर वेंटिलेटर का काम कर पाना मुश्किल हो जाता है।
पैरामेडिकल स्टाफ भी नहीं प्रशिक्षित
वेंटिलेटर का संचालन करने के लिए स्टाफ का भी प्रशिक्षित होना आवश्यक है। वैसे तो मेडिकल कॉलेज के इमरजेंसी प्रभारी डॉ. अमित आनंद, एनेस्थेटिस्ट डॉ. विकास चंद्रा, सर्जन डॉ. बीएमएस पोखरिया को प्रशिक्षण दिया जा चुका है लेकिन करीब आठ पैरामेडिकल स्टाफ को प्रशिक्षण नहीं मिला है। इसके पीछे वजह है कि फरवरी 2024 से राज्य स्तर पर प्रशिक्षण ही नहीं हुआ जबकि मेडिकल कॉलेज से पैरामेडिकल स्टाफ के नाम भेजे जा चुके हैं।
केस-1- मल्लावां में ईंट भट्ठ्रे पर काम करने वाली सुखवारा का नाम अब भले ही जेहन से उतर गया हो लेकिन उनकी मौत ने मेडिकल कॉलेज की व्यवस्था पर सवाल खड़े किए थे। मेडिकल कॉलेज में वेंटिलेटर नहीं मिला, लखनऊ में भी समय से उपचार न होने से उन्होंने दम तोड़ दिया था।
केस-2- देहात कोतवाली के गोधाई गांव निवासी बब्बू के आठ माह के मासूम अरविंद को भी अगर मेडिकल कॉलेज में वेंटिलेटर मिल जाता तो उसे रेफर करने की नौबत न आती और न एंबुलेंस कर्मी की लापरवाही से मासूम की मौत होती।
वेंटिलेटर संचालन के लिए आवश्यक तकनीकी व्यवस्थाओं पर काम किया जा रहा है। ऑक्सीजन प्रेशर की समस्या दूर करने और स्टाफ के प्रशिक्षण के बाद जल्द ही यह सुविधा मरीजों के लिए शुरू कर दी जाएगी। -डॉ. जेबी गोगोई, प्रधानाचार्य, मेडिकल कॉलेज
फोटो- 04- मेडिकल कॉलेज स्थिति आईसीयू वार्ड। संवाद