बीती रात कोटलां में हुए महफिल-ए-मुशायरा में शायरों
ने आपबीती और जगबीती को शायरी बनाकर पेश किया। आधी रात तक लोग प्यार
मोहब्बत, दीन, दुनिया, और सियासत व सियासत वालों पर शेर सुनकर लुत्फ उठाया।
संचालक
की नाते पाक से शुरू मुशायरे में मोहसिन जमीर जैदी ने अपने तजुर्बात को
गजल बनाकर पेश किया तो आवाज और कलाम पर तालियां बजीं, बुझी न प्यास मेरी,
सामने समंदर था। वो मेरे जर्फ को अच्छी तरह समझने लगा। बुजुर्ग शायर यासीन
औरंगाबादी ने शेर सुनाया, क्या भी कत्ल गर उसको तो क्या मिला जालिम।
जो खुद
ही बैठा हो जीने से हाथ उठाए हुए। बेकल पिहानवी ने चिर परिचत अंदाज में
गजल पढ़ी तो नौजवान दिल धड़क उठे- ये सुराही सा बदन लेके मेरे पास न आ। मैं
शराबी हूं, शराबी का भरोसा क्या है। नौजवान शायर सलमान जफर के ये मिसरे
उनसे बार-बार सुने गए, तुम बुजुर्गों की नसीहत से पक जाओगे।
जिंदगी इतना
रुलाएगी कि थक जाओगे। तुम बड़े-बूढ़ों की खिदमत में लगा दो सबको। मेरा दावा
है कि दुनिया में चमक जाओगे। लईक पिहानवी ने पढ़ा, जिधर गया मैं उधर
तंग रास्ता ही रहा। कदम-कदम पे मेरे साथ हादसा ही रहा। हैदर पिहानवी
दास्ताने इश्क बयान करते हुए हाल-ए-दिल तक आ गए, बोले, हम पर ही इलजाम नहीं
है, कौन यहां बदनाम नहीं है। बात भी की, तस्वीर भी देखी।
दिल को मगर आराम
नहीं है। चांद देहलियावी ने अपने कलाम से अंदर तक गुदगुदाया, यारों की
तौहीन न कर। चाय दो में तीन न कर। जमाल शहनवाज ने पढ़ा, बरसता है जो बनकर
अब्रे रहमत खल्क के खातिर। वो पानी है समंदर का, मगर खारा नहीं लगता।
इसके
अलावा मास्टर साजिद एवं एमएफ कैफी ने भी शेर पढ़े। मुशायरे की अध्यक्षता
अजादार हुसैन जैदी ने की, जबकि संचालन एमएफ कैफी ने किया। अंत में आयोजक
मुशायरा शबीह हैदर जैदी रूमी ने आभार जताया। स मौके पर मुख्तार हुसैन
जैदी, अम्मार जैदी, विमलेश तिवारी, मोनू कुरैशी, मतीन साबिर सिद्दीकी, अहमद
नदीम, अतीक मंसूरी, रिजवान खां व वसी हैदर जैदी आदि मौजूद थे।