हरदोई। बिलग्राम क्षेत्र में गंगाघाट पर माघ माह की पहली तारीख से रमनगरिया बसी है। इसमें करीब दो हजार श्रद्धालु कल्पवास के लिए आए हैं। सुबह गंगा में डुबकी लगा रहे, लेकिन पक्के घाट नहीं बने होने से श्रद्धालुओं को परेशानी हो रही है।
क्षेत्रीय लोगों ने करीब तीन साल पहले जन प्रतिनिधियों को ज्ञापन देकर गंगा के तट पर पक्का घाट बनवाने की मांग की थी, लेकिन अब तक जिला प्रशासन या किसी भी जनप्रतिनिधि ने इस ओर ध्यान नहीं दिया
जिससे लोग अभी भी स्नान करने के बाद कच्चे घाटों पर ही हर-हर गंगे का उद्घोष करने को विवश हो रहे हैं। आध्यात्मिक रूप से नैमिषारण्य क्षेत्र में माने जाने पांच नदियों वाले जिले में कोई भी गंगा तट पक्का नहीं है।
गंगा तट पक्का न होने के कारण विभिन्न पर्वों पर गंगा स्नान के लिए आने वाले हजारों श्रद्धालुओं को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही माघ माह में गंगा तटों पर लगने पर कल्पवासियों के जमावड़े के लिए तमाम प्रकार की दिक्कतें भी हो रही हैं।
गौरतलब हो कि माघ माह में गंगा तटों के किनारे प्रवास करने की धार्मिक मान्यताओं के चलते हर वर्ष बड़ी तादाद में साधु-संत समाज के लोगों के साथ आमजन भी गंगा तटों के किनारे अस्थायी प्रवास के लिए राउटी टेंट, झोपड़ी आदि की व्यवस्था कर रह रहे हैं।
इस दौरान वहां मेला जैसा वातावरण है, जिसे रामनगरिया कहा जाता है। इस कल्पवास को रामनगरिया मेला कहे जाने एवं माने जाने के पीछे धार्मिक महत्व है।
गंगा का आध्यात्मिक ही नहीं पौराणिक भी खासा महत्व है और मोक्षदायिनी गंगा मां का सदियों से महत्व एवं आस्था के रूप में मान्यता चली आ रही है।
स्नान पर्वों पर यहां लगता है बड़ा जमघट
जिले की प्रमुख पांच नदियों में गंगा एवं इसकी सहायक नदी रामगंगा, गंभीरी, नीलम, गर्रा का अद्भुत संगम राजघाट से पहले हो जाता है, इसलिए गंगा के इस तट को राजघाट कहा जाता है।
जिले की बिलग्राम तहसील के छिबरामऊ गांव के निकट स्थित राजघाट का महत्व आसपास के इलाकों के लिए प्रयागराज के संगम जैसा ही है। प्रयागराज की तरह यहां भी माघ मेले जैसा अद्भुत कल्पवास का मेला लगता है।
साथ ही हजारों श्रद्धालु कई स्नान पर्व के अवसरों पर मां गंगा मइया को नमन कर सुख-सृमद्धि की कामना करते हैं।
30 दिन तक लगता है आस्था का मेला
हर साल माघ माह में करीब 30 दिनों तक चलने वाला परंपरागत एवं आस्था का प्रतीक कल्पवास और गंगा मेला का विशेष धार्मिक महत्व है। मकर संक्रांति पर भी यहां भारी भीड़ होती है।
यह गंगा तट पक्का न होने से यहां पर श्रद्धालुओं को तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। राजघाट के अलावा जिले के तेरा पुरसौली, कुसुमखोर, फरहन्ना, चियासर आदि गंगा तट हैं, लेकिन कोई भी गंगा तट पक्का न होने से लोगों को दिक्कतें होती हैं।
दर्जनों बार बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं ने भी पक्के घाटों की मांग उठाई, लेकिन उनकी मांग पर आज तक कोई सुनवाई नहीं हो सकी।
हजारों की भीड़ रोज करती गंगा में स्नान
राजघाट पर हर वर्ष लगने वाले माघ मेले में हजारों लोग कल्पवास करते हुए गंगा तट के किनारे प्रवास करते हैं। करीब एक माह तक चलने वाले इस मेले में इस दौरान लाखों लोगों का आवागमन भी होता है।
वह बिना कोई शिकायत किए स्नान पर्व में डुबकी लगाकर धार्मिक और आध्यात्मिक आनंद का लाभ लेकर अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं। कल्पवास के दौरान भोर होते ही हर-हर गंगे के जयघोष सुनाई पड़ते हैं।
दिन में आध्यात्मिक प्रवचन एवं कथा आयोजन के साथ भंडारे चलते हैं। शाम को गंगा मां की आरती के बाद भजन कीर्तन चलते रहते हैं।
पक्के घाट की बनी योजना, पर काम नहीं हुआ
गंगा तट राजघाट जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर है।
कन्नौज और हरदोई जिले की सीमाओं पर स्थित इस गंगा तट का धार्मिक महत्व है। तीन वर्ष पहले तत्कालीन जिलाधिकारी पुलकित खरे ने लगातार निरीक्षण किया और गंगा तट की साफ-सफाई से लेकर मेले के दौरान आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित कराईं थी।
जिला प्रशासन की ओर से राजघाट को पक्का घाट बनाने के लिए कार्ययोजना बनाकर भी शासन को भेजी गई थी, लेकिन उसके बाद कोई कार्यवाही नहीं हो सकी।
इस संबंध में अपर जिलाधिकारी वंदना त्रिवेदी का कहना है कि कार्ययोजना के बारे में जानकारी करने के बाद बता सकेंगी कि कार्यवाही किस स्तर तक हुई है।