हरदोई। बहुजन समाज पार्टी ने पूर्व मंत्री रामपाल वर्मा को पार्टी से बाहर कर दिया है। यह कार्रवाई पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप के बाद की गई है। गांव की प्रधानी से राजनीतिक सफर शुरू करने वाले वर्मा छह बार विधायक रह चुके हैं। पिछले चुनाव में वह सपा प्रत्याशी से मामूली अंतर से हार गए थे।
रामपाल वर्मा ने कोथावां ब्लॉक के शाहपुर गांव की प्रधानी से राजनीति सफर शुरू किया। इसके बाद कोथावां से ब्लॉक प्रमुख चुने गए। 1984 में बेनीगंज सुरक्षित सीट से निर्दलीय विधायक बनने के बाद रामपाल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह कांग्रेस के टिकट पर 1988 व 1991 में विधानसभा चुनाव जीते।
इसकेबाद 1993 में चुनाव हारने के बाद सपा में चले गए। वर्ष 1996 में फिर विधायक बने, लेकिन अगला चुनाव हारने के बाद हाथी पर सवार हो गए। 2004 के उपचुनाव और 2007 के चुनाव में वह बसपा के टिकट पर विधायक बने और बसपा सरकार में स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री रहे।
परिसीमन में बेनीगंज सीट समाप्त होकर बालामऊ नई बनी। रामपाल 2012 का चुनाव हाथी चुनाव चिन्ह पर बालामऊ से लडे़। इसमें सपा के अनिल वर्मा से वह महज 147 वोटों से मात खा गए। वर्मा एक बार लोकतांत्रिक कांग्रेस के टिकट पर मिश्रिख और एक बार सपा के टिकट पर हरदोई से लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुके हैं।
छह बार विधायक और एक बार प्रदेश सरकार में मंत्री रहे रामपाल वर्मा धारा के विपरीत चलने वाले नेता हैं। उन्होंने चुनाव के मैदान में बड़ी से बड़ी राजनीतिक लहर को चीरकर इतिहास कायम किया है। गांव के प्रधानी से प्रदेश सरकार में मंत्री रहने वाले रामपाल वर्मा चुनाव हारने के बाद पार्टी बदलने में भी माहिर रहे हैं।
उनके दूसरे दल में जाने की चर्चा लंबे समय से थी। वह पार्टी छोड़ते इससे पहले ही बसपा ने उन्हें बाहर कर दिया। कोथावां ब्लॉक के शाहपुर गांव के रामपाल वर्मा पासी बिरादरी में दबदबा रखने वाले कुबेर पासी के भाई हैं। रामपाल ने राजनीति की शुरुआत गांव की प्रधानी से की थी।
इसके बाद कोथावां से प्रमुख चुने गए। 1984 में वह निर्दलीय बेनीगंज सुरक्षित सीट से चुनाव मैदान में उतरे। देश में इंदिरा गांधी की जबरदस्त लहर होने के बावजूद रामपाल विधायक चुने गए। क्षेत्र में उनकी राजनीतिक ताकत को देखते हुए कांग्रेस ने उन पर डोरे डाले। इसका नतीजा ये हुआ कि वह कांग्रेस में शामिल हो गए और 1989 में पंजे के निशान पर चुनाव लड़े।
जनता लहर के बावजूद वर्मा चुनाव जीत गए। 1991 के चुनाव में रामलहर में जब सूबे में भगवा लहरा रहा था तब भी रामपाल कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा पहुंचे। 1993 सपा-बसपा गठबंधन ने उनकी विजयी रथ को रोक दिया। ये चुनाव हारने के बाद रामपाल ने कांग्रेस छोड़ सपा ज्वाइन कर ली।
1996 के चुनाव में सपा की साइकिल पर सवार होकर फिर विधानसभा पहुंचे। 2001 का चुनाव हारने के बाद फिर दल बदल लिया। 2004 के उपचुनाव बसपा के टिकट पर विधायक बने। 2007 में फिर बसपा से ही विधायक चुने गए। प्रदेश में बसपा की सरकार बनने पर मायावती ने उन्हें स्वतंत्र प्रभार राज्यमंत्री बनाया।
2012 के चुनाव में सपा की लहर में रामपाल की विजय की कश्ती किनारे पर डूब गई। सपा के अनिल वर्मा ने उन्हें महज 147 वोटों से मात दे दी। रामपाल वर्मा लोकतांत्रिक कांग्रेस के टिकट पर मिश्रिख और सपा के टिकट पर हरदोई से लोकसभा चुनाव भी लड़ चुके हैं।