बावन(हरदोई)। खेत में जैविक खाद और खरपतवार नाशक का इस्तेमाल कर किसान ने तरक्की की राह अपनाई है। ये अन्य किसानों के लिए नजीर है। बावन विकास खंड के ग्राम मुजाहिदपुर निवासी रामबहादुर कुशवाहा खुद जैविक खाद और खरपतवार नाशक बनाते हैं। इसके जरिए प्रगतिशील किसानों की फेहरिस्त में उन्होंने अपना नाम जोड़ लिया है।
रामबहादुर कुशवाहा कृषि विज्ञान केंद्र से आने वाले वैज्ञानिकों का साथ पाकर काफी जानकार हो चुके हैं। 35 वर्षीय रामबहादुर हाईस्कूल पास हैं। खेती में आधुनिक तरीके और जैविक खाद का इस्तेमाल करने की ललक उनमें हमेशा से ही रही। रामबहादुर बताते हैं कि कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि प्रसार केंद्र के अलावा चंद्रशेखर आजाद विश्वविद्यालय कानपुर भी विभिन्न प्रशिक्षणों में शामिल होने के लिए जाते हैं। वहां जो कुछ सीखते हैं, उसका उपयोग करते हैं और नतीजा सबके सामने है।
रामबहादुर की पहचान पूरे इलाके में ऐसे किसान के रूप में है, जिसके खेतों में उर्वरक का इस्तेमाल नहीं होता। वह अपने खेतों में सरसों, बैंगन, मिर्च के अलावा मेंथा की भी खेती कर रहे हैं। रामबहादुर बताते हैं कि उनके पास आठ बीघा कृषि योग्य भूमि है और जैविक खेती से फसलों का उत्पादन बढ़ा है। वह कहते हैं कि सामान्य तौर पर एक बीघे में एक से डेढ़ क्विंटल सरसों भी निकलना मुश्किल हो जाती है, लेकिन उनके खेत में जैविक खादों के प्रयोग के कारण दो क्विंटल प्रति बीघा सरसों का उत्पादन होता है।
ऐसे बनाते हैं जैविक खाद
रामबहादुर बताते हैं कि गाय के दो क्विंटल गोबर में 25 ग्राम जैविक अपघटक मिलाकर गोबर को फट्टे या तिरपाल से ढक देते हैं। तीन दिन बाद गोबर सड़कर दानेदार बन जाता है। इसको खेतों में जैविक खाद के रूप में प्रयोग करते हैं।
ऐसे बनाते हैं खरपतवार नाशक
रामबहादुर कुशवाहा के मुताबिक पांच लीटर गोमूत्र में पांच किलो गाय का गोबर और पांच किलो नीम की पत्ती को पीसकर मिला लेते हैं। तीनों चीजों को मिलाकर 10 लीटर पानी में 24 घंटे के लिए रख देते हैं। फिर उसी 10 लीटर पानी में बायोडी कंपोजर का एक लीटर पानी भी मिला देते हैं। इसे फिर से 10 दिन के लिए रख दिया जाता है। इसके बाद बारीक कपड़े से छानकर उसे 120 लीटर पानी में मिला लेते हैं। एक एकड़ फसल में 120 लीटर घोल का छिड़काव कर दिया जाता है।
ऐसे समझिए अर्थगणित
आठ बीघा सरसों की फसल तैयार करने में 22540 रुपये की लागत औसतन आती है। प्रति बीघा लगभग दो क्विंटल सरसों का उत्पादन होता है और लगभग 48 हजार रुपये इसे बेचकर मिलते हैं। लागत निकालकर 25460 रुपये बच जाते हैं।