सुन्नते इब्राहीमी की अदायगी का पर्व बकरीद आज मनाया
जाएगा। इसे लेकर मुसलिमों में तैयारियों का दौर देर शाम तक जारी रहा। सुबह
नमाजे ईद की अदायगी के साथ ही तीन दिन तक चलने वाले कुर्बानी के सिलसिले का
भी आगाज हो जाएगा।
ईद-उल-अजहा (बकरीद) इस्लामी साल के अंतिम महीने जिल
हिज्जह की दस तारीख को मनाई जाती है। इस बार बकरीद 25 सितंबर (आज) मनाई
जाएगी। ईद-उल-अजहा पैगंबर हजरत इब्राहीम और उनके पैगंबर बेटे हजरत इस्माइल
की सुन्नत (कुर्बानी) की अदायगी का पर्व है।
कुब्रानी का मकसद जानवर को
राहे खुदा में कुर्बान कर देना भर नहीं, बल्कि इसका मकसद अपनी भावनाओं को
रब के हुक्म पर निसार कर देना है। जैसा पैगंबर पिता-पुत्र ने किया था। हजरत
इब्राहीम ने हुक्म-ए-खुदा पर अपने बेटे (हजरत इस्माइल) को राहे खुदा में
कुर्बान कर देने का फैसला किया था।
वह अपने इंतहान में कामयाब हुए। आप की
यह अदा खुदा को इस कद्र भाई कि उसने तमाम निश्चित हैसियत वाले मुसलिमों के
लिए यह जरूरी करार दे दी। राहे खुदा में कुर्बानी देकर दरअसल व्यक्ति
अपने जज्बात की कुर्बानी पेश करता है। कहा गया है कि कुर्बानी का गोश्त और
खून अल्लाह के यहां कोई हैसियत नहीं रखता।
वह तो सिर्फ बंदे के जज्बात
देखता है। बकरीद पर नमाज की अदायगी के बाद कुर्बानी करने का सिलसिला भी
शुरू हो जाएगा। निश्चित उम्र और हालत के हलाल जानवर की कुब्रानी का यह
सिलसिला बकरीद से लेकर तीन दिन तक जारी रहेगा। मसजिदों से उलमा-ए-कराम ने
कुर्बानी से संबंधित मसायल समझाते हुए निश्चित हैसियत रखने वालों से
कुरबानी करने का आह्वान किया है।