तीन दिवसीय जलसा सीरतन्नबी और सीरत-ए-सहाबा एवं
मुशायरे के तहत शुक्रवार की रात हुई पहली मजलिस में मदरसा जामिया मसऊदिया
नूरूल उलूम बहराईच के मुफ्ती मोहम्मद हारिस अब्दुर्रहीम फारूकी लखनवी व
मदरसा फैजुल कुरान माधौगंज हरदोई के प्रबंधक मौलाना अब्दुल जब्बार की
तकरीरें हुईं।
इस दौरान उलमा-ए-कराम ने नबी और सहाबा-ए-कराम के हुक्म पर
चलने की अपील करते हुए कहा कि इनका रास्ता ही सीधा रास्ता और कामयाबी की
तरफ ले जाने वाला है। मौलाना उसमान गनी मजाहिरी की अध्यक्षता में हुए जलसे
में मौलाना हारिस ने कहा कि कौम हर तरफ से तबाही और जिल्लत का शिकार हो रही
है।
मुसलिमों को चाहिए की अपने माहौल को बदलें और उस तरीके की तरफ लौटें
जो हमारे नबी हमें देकर गए हैं। यही हमारे लिए जरीआ-ए-निजात भी बनने वाला
है। मौलाना अब्दुल जब्बार ने अपनी तकरीर में समाज में पनप रही बुराइयों पर
फिक्र का इजहार करते हुए कहा कि हमारे नबी इन्हीं बुराइयों का खात्मा करने
आए थे।
सोचना चाहिए कि आज जिन प्रचलित बुराइयाें को कई समाजी संगठन,
मीडिया, नेता, अफसर खत्म नहीं कर पा रहे, उन्हें खत्म करने को एक अल्लाह का
रसूल खड़ा हो गया था। कहा कि आपने न केवल इन बुराइयों को मिटाया, बल्कि
इसलाम के रूप में आदर्श जीवन जीने का एक ऐसा तरीका दे दिया, जिसको अपनाकर
हम अपनी दुनिया और अखिरत दोनों संवार सकते हैं।
मौलाना ने कहा कि समाज
बेटियों का पैदा होना जब एक शर्मिंदगी समझता था, जरा सी बात पर कत्ल करना
आम बात थी और शराब नोशी को जिंदगी की शान समझा जाता था। ऐसे वक्त में इनके
खिलाफ लड़ाई छेड़ कर लोगों को कामयाबी की तरफ बुलाने वाला हमारा नबी ही तो
था।
और आज दुनिया देख रही कि हमारे नबी का तरीका कैसे पूरे विश्व में फल
फूल रहा है। आप ही वह पहली शख्सियत थे जिसने बेटी को जहमत नहीं अल्लाह की
रहमत बताया। कहा कि बेटियों के सम्मान को दुनिया आज बातें कर रही, पर
हमारे नबी ने चौदह सौ साल पहले उन्हें जो मुकाम दे दिया, वह अब तक उनके
सम्मान का प्रतीक बना हुआ है।
मौलाना आबिद असअदी की संरक्षता में हुए
कार्यक्रम की शुरुआत कारी अलताफ की तिलावते कुरान से हुई। इस मौके पर
हकीमुद्दीन, फहीमुद्दीन व अली आदि ने नात पढ़ी। संचालन मौलाना सगीर अहमद
कासमी ने किया। मौलाना अब्दुल जब्बार की दुआ पर पहले जलसे का समापन हुआ।
अंत में संयोजक मुईनुद्दीन अंसारी ने आभार जताया।